Weather IMD US Israel Iran War

कैसे सीएम बनने के बाद भी कम नहीं होने वाली है डीके शिवकुमार की मुसीबतें? विपक्ष के साथ-साथ अपनों से भी पंगा!

कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कमान संभालते ही डीके शिवकुमार के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो गया है. उन्हें विपक्ष के हमलों के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा.

Social Media
Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: कर्नाटक की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद भी डीके शिवकुमार की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं. मुख्यमंत्री का पद संभालना उनके लिए जितना बड़ा गौरव है, उससे कहीं अधिक यह एक कांटों भरा ताज साबित होने वाला है. राज्य की कमान हाथ में आते ही उन्हें न केवल आक्रामक विपक्ष से निपटना होगा, बल्कि कांग्रेस के भीतर मौजूद अपने ही प्रतिद्वंद्वियों को भी संतुष्ट रखना होगा. ऐसे में उनके प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल की असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है.

शिवकुमार के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती अपने नए मंत्रिमंडल का गठन करना है. इस मामले में उनके हाथ पूरी तरह बंधे हुए हैं. उन्हें अपने वफादार विधायकों के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी गुट के नेताओं को भी कैबिनेट में सम्मानजनक जगह देनी होगी. इसके साथ ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की पसंद के मंत्रियों को भी शामिल करना होगा. असली सिरदर्द मलाईदार मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर होने वाला है, जहां हर कोई बड़ा पद चाहता है.

सिद्धारमैया की पैनी नजर और दबाव

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने साफ कर दिया है कि वे दिल्ली की राजनीति में जाने के बजाय कर्नाटक में ही सक्रिय रहेंगे. इसका सीधा मतलब यह है कि वे सरकार के बाहर रहकर भी एक समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में काम करेंगे. सिद्धारमैया की पैनी नजर शिवकुमार के हर प्रशासनिक फैसले पर टिकी रहेगी. इसके अलावा, नए प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल सतीश जरकीहोली संगठन के शीर्ष पद के साथ कैबिनेट मंत्री का मलाईदार पोर्टफोलियो भी मांग रहे हैं, जिससे संकट और गहरा गया है.


अहिंदा वोट बैंक संभालने का इम्तिहान

शिवकुमार के लिए राज्य के पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखना बेहद मुश्किल होगा. सिद्धारमैया का दबदबा 'अहिंदा' यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं पर रहा है. वोकाल्लिगा समुदाय से आने वाले शिवकुमार को अब इन सभी वर्गों का भरोसा जीतना होगा. राहुल गांधी के पसंदीदा प्रोजेक्ट यानी जातीय सर्वेक्षण को लागू करना भी उनके लिए अनिवार्य है, जिसे सिद्धारमैया कैबिनेट से मंजूरी दिला चुके हैं. इस सामाजिक संतुलन को साधना उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा होगी.

विपक्ष की घेराबंदी और बेंगलुरु का संकट

विपक्षी खेमे में भाजपा और जेडीएस का गठबंधन शिवकुमार को कड़ी टक्कर देने के लिए तैयार है. भाजपा ने लिंगायत समुदाय के कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को प्रदेश की कमान सौंपकर अपनी चाल चल दी है. दूसरी तरफ, पिछले तीन वर्षों से बेंगलुरु विकास मंत्रालय संभाल रहे शिवकुमार को जलभराव और ट्रैफिक जाम जैसी बुनियादी समस्याओं पर जनता को जवाब देना होगा, क्योंकि देश के इस सबसे बड़े आईटी हब की हर परेशानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनती है.

वादों को निभाने और खजाने की चुनौती

भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के साथ-साथ कांग्रेस की पांच मुख्य गारंटी योजनाओं को निरंतर जारी रखना शिवकुमार की सबसे बड़ी वित्तीय चुनौती है. इन जनकल्याणकारी योजनाओं पर राज्य के सरकारी खजाने से हर साल लगभग पचास हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं. कर्नाटक का चार दशकों का इतिहास रहा है कि यहां जनता हर चुनाव में सरकार बदल देती है. शिवकुमार के पास खुद को एक सफल प्रशासक साबित करने के लिए केवल दो वर्ष का समय बचा है.