सेना के कुत्तों की रिटायरमेंट के बाद कैसे होती है देखभाल? जानिए पेंशन से लेकर गोद लेने तक की पूरी जानकारी

भारतीय सेना के प्रशिक्षित कुत्ते विस्फोटक और खदानें खोजने, ट्रैकिंग, सुरक्षा और बचाव जैसे बेहद महत्वपूर्ण अभियानों में भूमिका निभाते हैं. सेवा पूरी होने के बाद इन्हें पेंशन नहीं मिलती, लेकिन सेना और सरकार इनके भोजन, इलाज और रहने की व्यवस्था करती है.

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Shanu Sharma

भारतीय सेना में प्रशिक्षित कुत्ते केवल सुरक्षा में मदद करने वाले जानवर नहीं होते, बल्कि कई अभियानों में सैनिकों के महत्वपूर्ण साथी होते हैं. इन्हें विस्फोटकों और खदानों का पता लगाने, संदिग्ध लोगों या वस्तुओं की खोज, ट्रैकिंग, रखवाली और बचाव अभियान जैसे कठिन कामों के लिए तैयार किया जाता है. कई बार इनकी सूंघने की क्षमता ऐसे खतरे का पता लगा सकती है, जिसे इंसान आसानी से नहीं पहचान पाता.

मानव सैनिकों की तरह सेना के कुत्तों को सेवानिवृत्ति के बाद मासिक वेतन या नकद पेंशन नहीं दी जाती. हालांकि, सेवा समाप्त होने के बाद उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती. सेना और सरकार इनके रहने, भोजन और चिकित्सा जैसी जरूरी जरूरतों का इंतजाम करती हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लंबे समय तक देश की सेवा करने वाले इन कुत्तों को बुढापे में सुरक्षित जीवन मिल सके.

मेरठ और हेमपुर में होती है देखभाल

सेवानिवृत्त सेना के कुत्तों को निर्धारित पुनर्वास केंद्रों में रखा जाता है. उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित रिमाउंट वेटरनरी कॉर्प्स सेंटर और कॉलेज में इनके लिए वृद्ध आश्रम जैसी सुविधा है. इसके अलावा उत्तराखंड के हेमपुर स्थित केंद्र में भी सेवानिवृत्त कुत्तों की देखभाल की जा सकती है. यहां उनके भोजन, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है. कुछ मामलों में सेवानिवृत्त सेना के कुत्तों को आम नागरिक, स्कूल या कुत्ता प्रेमी संगठन गोद ले सकते हैं. इसके लिए संबंधित आरवीसी केंद्र में लिखित आवेदन देना होता है. आवेदक की जांच और जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद कुत्ते को सौंपा जा सकता है. गोद लेने के बाद उसकी देखभाल, भोजन और इलाज की जिम्मेदारी नए मालिक की होती है.


छह महीने की उम्र से शुरू होता है प्रशिक्षण

सेना के कुत्तों का विशेष प्रशिक्षण आमतौर पर करीब छह महीने की उम्र में शुरू हो जाता है. करीब छह से नौ महीने तक चलने वाले इस प्रशिक्षण में उनकी क्षमता के अनुसार अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है. विस्फोटक या खदान खोजने से लेकर ट्रैकिंग और बचाव तक, प्रशिक्षण बेहद कठिन और अनुशासित होता है. एक सैन्य कुत्ता सामान्य तौर पर करीब आठ से नौ साल तक सेवा करता है. हालांकि उसकी सेवानिवृत्ति केवल उम्र के आधार पर तय नहीं होती.

शारीरिक क्षमता और कठिन सैन्य जिम्मेदारियां निभाने की योग्यता भी महत्वपूर्ण होती है. जब कुत्ता सक्रिय सेवा के लिए उपयुक्त नहीं रहता, तब उसे सेवानिवृत्त कर दिया जाता है. सेना के कुत्तों को सैन्य इकाई का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. उन्हें सेवा संख्या और रैंक भी दी जाती है. असाधारण प्रदर्शन करने वाले कुत्तों को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ प्रशस्ति कार्ड जैसे सम्मान मिल सकते हैं. कुछ कुत्तों को उनकी सेवा और बलिदान के लिए मरणोपरांत वीरता सम्मान भी दिया गया है.