उत्तराखंड की सबसे कठिन और लंबी पैदल धार्मिक यात्रा नंदा देवी राजजात को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है. वर्ष 2026 में प्रस्तावित यह ऐतिहासिक यात्रा अब स्थगित कर दी गई है. नंदा देवी राजजात यात्रा समिति ने जानकारी दी है कि यह यात्रा अब साल 2027 में आयोजित की जाएगी. अंतिम और औपचारिक घोषणा 23 जनवरी को मनौती कार्यक्रम के दिन की जाएगी. नंदा देवी राजजात को “हिमालय का महाकुंभ” भी कहा जाता है और यह यात्रा हर 12 साल में निकलती है.
राजजात समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में यात्रा से जुड़े कई जरूरी कार्य समय पर पूरे नहीं हो पाए हैं. साथ ही, वर्ष 2026 में तय तिथियों के अनुसार यात्रा सितंबर में उच्च हिमालयी इलाकों तक पहुंचती, जहां उस समय भारी बर्फबारी और खराब मौसम की आशंका रहती है.
उन्होंने कहा कि निर्जन पड़ावों पर अभी जरूरी व्यवस्थाएं पूरी नहीं हैं. ऐसे में यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर जोखिम बढ़ सकता था. इन्हीं कारणों से सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि यात्रा 2026 के बजाय 2027 में कराई जाए.
समिति के महासचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि यह पहली बार है जब राजजात यात्रा के लिए शुभ मुहूर्त के अनुसार विधिवत संकल्प लिया गया है. उनके अनुसार, केवल 12 साल पूरे होने के आधार पर यात्रा कराना हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि हिमालयी परिस्थितियां कभी-कभी बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं.
नंदा देवी राजजात लगभग 280 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा है, जो चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड तक जाती है. यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है.
इस यात्रा की सबसे खास परंपरा चौसिंगा यानी चार सींग वाला खाडू है. मान्यता है कि खाडू के जन्म से ही राजजात का समय तय हो जाता है. खाडू को मां नंदा का प्रतीक माना जाता है और वही यात्रा का अग्रदूत होता है.
चमोली के जिलाधिकारी ने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित कराना है. समिति से औपचारिक सूचना मिलने के बाद प्रशासन पूरी तैयारी के साथ सहयोग करेगा.
फिलहाल राजजात प्रेमियों की नजर 23 जनवरी पर टिकी है, जब 2027 में यात्रा आयोजन को लेकर अंतिम घोषणा की जाएगी. यह फैसला सुरक्षा, मौसम और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.