सोंग नदी को बचाने की बड़ी पहल! 80 KM तक होगा सर्वे, 5 जीव बताएंगे पानी कितना साफ

​पूर्वी दून घाटी की जीवनरेखा कही जाने वाली सोंग नदी और उसकी पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) को सहेजने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है.

India Daily 24x7
Shilpa Srivastava

देहरादून: ​पूर्वी दून घाटी की जीवनरेखा कही जाने वाली सोंग नदी और उसकी पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) को सहेजने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA), उत्तराखंड के तहत सोंग नदी क्षेत्र में 'बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट' की शुरुआत कर दी गई है.

​इस महत्वाकांक्षी परियोजना का मुख्य उद्देश्य जैविक संकेतकों के माध्यम से जल की गुणवत्ता, नदी किनारे के आवास और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव का त्वरित और सटीक मूल्यांकन करना है. भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक 'जी' डॉ. वी.पी. उनियाल के मार्गदर्शन में यह शोध अध्ययन संपन्न किया जाएगा.

​नदी का जैविक स्वास्थ्य बताएंगे ये 5 प्रमुख जीव-समूह:

​नदी के पानी और आसपास के पर्यावरण की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए 5 प्रमुख जीव-समूहों का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा, ​जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स, कीड़े व उनके लार्वा, जो जल प्रदूषण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं.


  • ​तितलियां और जंगली मधुमक्खियां नदी तट की हरियाली और परागण की स्थिति का संकेत देती हैं.

  • ​ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई पानी की स्वच्छता और नदी किनारे के प्राकृतिक परिवेश को दर्शाते हैं.

  • ​पक्षियों की प्रजातियां: पूरी नदी घाटी के संपूर्ण पारिस्थितिक स्वास्थ्य का खाका पेश करती हैं.

​36 स्थानों पर और दो अलग-अलग मौसमों में होगा सर्वे:

​यह शोध सोंग नदी के उद्गम स्थल कददूखल (टिहरी) से लेकर गंगा संगम तेहरी फार्म (देहरादून) तक लगभग 80 किलोमीटर के लंबे दायरे में किया जाएगा. ​अध्ययन के लिए नदी को ऊपरी, मध्य और निचले तीन हिस्सों में बांटा गया है. तीनों ज़ोन में 12-12 स्थायी स्टेशन बनाकर सर्वे किया जाएगा. फील्ड वर्क नवंबर से अप्रैल के बीच मानसून के बाद  और मानसून से पहले  के चरणों में पूरा होगा.

​संरक्षण नीतियों के लिए तैयार होगा बेसलाइन डेटा:

​इस छह-माही प्रोजेक्ट के जरिए सोंग नदी का एक व्यापक डेटाबेस  तैयार किया जाएगा. यह अध्ययन प्रस्तावित सोंग बांध खनन और बढ़ते शहरीकरण से नदी पर पड़ने वाले प्रभावों का सटीक आकलन करने में बेहद मददगार साबित होगा. इसके परिणामों के आधार पर भविष्य में नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए ठोस नीतियां बनाई जा सकेंगी.