कल से शुरू हो रही केदारनाथ धाम यात्रा, जानें कैसे यहां भगवान शिव का हुआ निवास? स्कंद पुराण में भी जिक्र
केदारनाथ धाम यात्रा 22 अप्रैल से शुरू होने जा रही है. हिंदू धर्म में इसे सबसे पवित्र स्थलों में गिना जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि कैसे यहां भगवान शिव का शिवलिंग कैसे बना.
हिंदू धर्म में चारधाम यात्रा का खास महत्व है. हर साल हजारों यात्री यहां दर्शन करने पहुंचते हैं. एक बार फिर से यह यात्रा शुरू होने जा रही है. अक्षय तृतीया के पावन पर्व से ही यह यात्रा अपने पूरे रंग में आ जाती है. 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलने जा रहे हैं, उससे पहले गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुल चुके हैं.
केदारनाथ धाम भगवान शिव को समर्पित है. हिमालय की गोद में स्थित यह मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र रहा है. इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. 22 अप्रैल को कपाट खुलते ही मंदिर में पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो जाएगा.
केदनाथ धाम की कहानी
केदारनाथ धाम का इतिहास बताते समय अक्सर महाभारत की कहानी याद की जाती है. युद्ध के बाद पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद पाने निकले थे. लेकिन शिवजी उन्हें कहीं दिखाई नहीं दिए. अंत में केदार घाटी में उन्होंने बैल का रूप धारण कर पांडवों को दर्शन दिए. इस वजह से कई लोग मंदिर को महाभारत कालीन मानते हैं.
केदारनाथ की वास्तविक और प्रामाणिक कथा स्कंद पुराण में विस्तार से वर्णित है. पुराण के अनुसार एक समय हिरण्याक्ष नाम का राक्षस त्रिलोकी पर छा गया था. उसने देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया. हार मान चुके देवराज इंद्र हिमालय की मंदाकिनी नदी के किनारे पहुंचे और एकांत में भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे. तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी भैंसे के रूप में प्रकट हुए. उन्होंने इंद्र की परीक्षा लेनी चाही और भैंसे के रूप में पूछा कि के दारयामि? अर्थात किसका विनाश करूं? इसी प्रश्न के अक्षरों से इस पवित्र भूमि का नाम केदार पड़ा. स्कंद पुराण में इसे केदार खंड भी कहा गया है.
इंद्र ने भैंसे को पहचान लिया और प्रणाम किया. भगवान शिव ने फिर वही प्रश्न दोहराया. इंद्र ने पांच प्रमुख दैत्यों के नाम बताए हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्रकंधर, त्रिशृंग और लोहिताक्ष. शिवजी ने भैंसे के रूप में इन सभी का संहार कर दिया. इसके बाद उन्होंने देवताओं की रक्षा की.
केदार कुंड का खास महत्व
देवताओं की रक्षा के बाद भगवान शिव ने यहां एक पवित्र कुंड की रचना की. इंद्र ने वरदान मांगा कि शिवजी इसी लिंग रूप में यहां निवास करें. शिवजी ने स्वीकार कर लिया और कहा कि मैं केदार शिव के नाम से यहां रहूंगा. श्रद्धालुओं के लिए यह कुंड विशेष महत्व रखता है. कुंड का जल दोनों हाथों से तीन बार पीने से माता-पिता के दोनों पक्ष की तीन पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है. बाएं हाथ से जल पीने पर मातृ पक्ष, दाएं हाथ से पितृ पक्ष और दोनों हाथों से स्वयं का उद्धार होता है.
और पढ़ें
- गुजरात के दाहोद में शादी में खाना खाने के बाद 400 से ज्यादा लोग पड़े बीमार, वीडियो में देखें कैसी है वहां की स्थिति
- अनिल कपूर की 24 से लेकर Strangers Things तक… इस हफ्ते OTT पर दस्तक देंगी ये मूवी-सीरीज
- पहलगाम में 26 मासूमों की हत्या कर जंगल भागे थे आतंकी, फिर भारतीय सेना ने 93 दिनों तक खदेड़ कर ऐसे उतारा मौत के घाट