हिमालय की 221 झीलों से नेपाल जैसी तबाही का खतरा, 491 साल में 254 बार फट चुकीं; उत्तराखंड पर भी मंडरा रहा संकट
हिमालय में ग्लेशियल झीलों और हैंगिंग ग्लेशियरों से अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है. नए अध्ययनों में 221 संवेदनशील झीलों और अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान हुई है.
नेपाल-तिब्बत सीमा पर अचानक आई बाढ़ के बाद हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों से जुड़े खतरे पर फिर चर्चा शुरू हो गई है. देहरादून के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत तीन संस्थानों के अध्ययन में 221 संवेदनशील ग्लेशियल झीलें सामने आई हैं. इनके फटने से अचानक बाढ़ आ सकती है. भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम की कई घाटियां चिंता वाले क्षेत्रों में हैं. उत्तराखंड में इसके साथ हैंगिंग ग्लेशियर भी बड़ा खतरा बन सकते हैं.
1990 के बाद हिमालय में बनीं 1,052 नई ग्लेशियल झीलें
अध्ययन के अनुसार हिमालय में इस समय करीब 8,357 से 9,280 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें 1990 के बाद 1,052 नई झीलें बनी हैं. ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण ऊंचाई वाले इलाकों में पानी जमा होने के लिए नई जगह बन रही है. इसका असर पुरानी झीलों पर भी पड़ा है और कई झीलों का आकार बढ़ा है. अलग-अलग अध्ययनों में इनके क्षेत्रफल में 17 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वहीं कुछ आकलनों में यह वृद्धि 76 प्रतिशत तक बताई गई. 2010 से 2020 के बीच बढ़ोतरी सबसे तेज रही और 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में इसका असर ज्यादा दिखाई दिया.
कोसी घाटी में 1,125 झीलें
ग्लेशियल झीलों की संख्या के मामले में कोसी घाटी सबसे आगे है. अरुण क्षेत्र में 1,125 झीलें दर्ज की गई हैं. यारलुंग जांगबो घाटी में 773, मानस की दांगमे चू घाटी में 715 और ऊपरी सिंधु क्षेत्र में 619 झीलें मिली हैं. पूरे हिमालय में जिन 221 झीलों को खास तौर पर संवेदनशील माना गया है, उनमें कोसी की 47 झीलें शामिल हैं. यारलुंग जांगबो और तीस्ता में 22-22, मानस में 21 और चिंगहाई-तिब्बती क्षेत्र में 15 ऐसी झीलें हैं. 1533 से 2024 तक के रिकॉर्ड में 254 GLOF घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें 184 घटनाएं ज्यादा या बेहद ज्यादा खतरे वाले क्षेत्रों में हुईं.
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उत्तराखंड में 219 हैंगिंग ग्लेशियर
उत्तराखंड के लिए चिंता केवल ग्लेशियल झीलों तक सीमित नहीं है. अलकनंदा बेसिन के अध्ययन में 848 ग्लेशियरों में से 219 को हैंगिंग ग्लेशियर माना गया है. इनका कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किलोमीटर है और इनमें लगभग 2.39 घन किलोमीटर बर्फ मौजूद है. करीब 0.74 घन किलोमीटर बर्फ को अस्थिर माना गया है. विष्णुगंगा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं. वैज्ञानिकों ने 25 ग्लेशियरों के आधार पर सबसे खराब स्थिति का मॉडल बनाया. इसमें बद्रीनाथ में बर्फ-मलबे का बहाव 51 मीटर, बद्रीनाथ-माणा सड़क पर 48 मीटर और नीलकंठ बेस कैंप के ऊपर 61 मीटर तक पहुंचने की संभावना दिखाई गई. यह आपदा की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि संभावित असर का मॉडल है. बद्रीनाथ-माणा से करीब 1.4 किलोमीटर ऊपर तीन ग्लेशियरों की भी पहचान की गई है.
इलाके में निर्माण भी तेज
अध्ययन में एक और चिंता सामने आई है. जिन इलाकों में प्राकृतिक खतरा मौजूद है, वहां इंसानी गतिविधियां भी बढ़ रही हैं. अलकनंदा बेसिन में 2000 से 2030 के बीच निर्मित क्षेत्र में करीब 120 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है. आबादी में भी करीब 17 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान है. संभावित बर्फ-मलबे के रास्ते वाले एक नमूना क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र 2000 के 8,025 वर्ग मीटर से बढ़कर 2030 में 1,51,800 वर्ग मीटर तक पहुंचने का अनुमान है. संभावित प्रभावित आबादी भी 380 से बढ़कर 8,540 हो सकती है.
समय पर निगरानी ही बचाव का रास्ता
वैज्ञानिकों का कहना है कि हर हैंगिंग ग्लेशियर को खतरनाक मानना सही नहीं होगा. जरूरत उन ग्लेशियरों की पहचान करने की है, जहां खतरा ज्यादा है. इसके बाद उनकी लगातार निगरानी जरूरी है. सैटेलाइट तस्वीरों के साथ जमीन पर कैमरे, रडार और बर्फ के भीतर होने वाली हलचल को देखने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. डॉप्लर रडार भी संभावित खतरे को समझने में मदद कर सकता है. समय रहते किसी ग्लेशियर में बदलाव या अस्थिरता के संकेत मिलें तो संवेदनशील सड़कें बंद करने, लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने और जरूरी सेवाओं को अलर्ट करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं.