देहरादून का मियावाकी मॉडल बना मिसाल, 300+ पौधों में 90% से ज्यादा अब भी जीवित

देहरादून के वसंत विहार में तीन साल पहले शुरू हुआ मियावाकी अर्बन फॉरेस्ट अब मिसाल बन गया है. 300 से ज्यादा पौधों में 90 प्रतिशत से अधिक आज भी जीवित हैं.

X
Ashutosh Rai

देहरादून के वसंत विहार में तीन साल पहले शुरू किया गया मियावाकी अर्बन फॉरेस्ट अब शहर के लिए हरियाली की नई उम्मीद बन रहा है. 300 से अधिक पौधों वाले इस प्रोजेक्ट में 90 प्रतिशत से ज्यादा पौधे जीवित हैं. लगातार देखभाल ने इस छोटे जंगल को मजबूत बनाया है.

तीन साल बाद भी 90% से ज्यादा पौधे सुरक्षित

वसंत विहार में पंडितवाड़ी मुख्य मार्ग पर मेजर विवेक गुप्ता चौक के पास 20 अगस्त 2023 को इस अर्बन फॉरेस्ट की शुरुआत हुई थी. यहां स्थानीय मौसम और जमीन के हिसाब से 300 से ज्यादा पौधे लगाए गए थे। पौधे लगाना आसान थी. उन्हें लंबे समय तक बचाए रखना बड़ी चुनौती थी. इसी वजह से एसडीसी फाउंडेशन और एसजीआई फाउंडेशन ने तीन साल तक इसकी देखभाल की. वन विभाग के रिसर्च विंग, वसंत विहार दून वैली ऑफिसर्स कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी और दोनों फाउंडेशन के साथ आने से यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ा. लगातार पानी, निगरानी और देखभाल के कारण 90 प्रतिशत से ज्यादा पौधे आज भी जीवित हैं.

कालसी के सफल मॉडल से मिली इस पहल को दिशा

देहरादून का यह प्रयोग उत्तराखंड में पहले किए गए मियावाकी प्रोजेक्ट्स से प्रेरित है. खास तौर पर कालसी में वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी और उनकी टीम के काम ने इसे आगे बढ़ाने में मदद की. तीसरी वर्षगांठ पर चतुर्वेदी ने कहा कि मियावाकी तकनीक का मतलब केवल ज्यादा पेड़ लगाना नहीं है. इसका मकसद स्थानीय पौधों और जैव विविधता को बढ़ावा देना भी है. इसके लिए सही पौधों का चुनाव, मिट्टी की तैयारी, पौधों के बीच उचित दूरी और लगातार देखभाल जरूरी है. शहरों में बढ़ती गर्मी के बीच ऐसे छोटे जंगल तापमान और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में मददगार हो सकते हैं.


समुदाय की भागीदारी से तैयार हुआ हरित क्षेत्र

एसडीसी फाउंडेशन के अनूप नौटियाल ने तीन साल पूरे होने को इस प्रोजेक्ट की अहम उपलब्धि बताया. उनका कहना है कि संस्थाएं, स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन मिलकर काम करें तो शहर के बीच भी अच्छा हरित क्षेत्र बनाया जा सकता है. एसजीआई फाउंडेशन की प्रेरणा रतूड़ी ने भी लंबे समय तक सामुदायिक भागीदारी को जरूरी बताया. उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल पौधरोपण दिवस तक सीमित नहीं रखना चाहिए. देहरादून का यह मॉडल दिखाता है कि सीमित जमीन पर स्थानीय प्रजातियों को लगाकर और उनकी लगातार देखभाल करके शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ाई जा सकती है.