दूध, पनीर, खोवा और क्रीम जैसे उत्पादों में मिलावट को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है. अब किसी डेयरी या निर्माण इकाई में खतरनाक रसायन या संदिग्ध वसा मिलने पर केवल नमूना लेकर रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया जाएगा. खाद्य सुरक्षा विभाग के नए निर्देशों के तहत उत्पादन रोकने, माल जब्त करने और लाइसेंस निलंबित करने जैसी कार्रवाई तत्काल की जा सकती है.
जांच के दौरान कुछ दुग्ध उत्पाद इकाइयों में ऐसे पदार्थों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है, जिनका खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है. इनमें रिफाइंड तेल और वसा, सोयाबीन उत्पाद, टेल्कम पाउडर, डिटर्जेंट, टाइटेनियम डाइऑक्साइड, लिक्विड ग्लूकोज और हाइड्रोजन परॉक्साइड जैसे पदार्थ शामिल हैं. इनका इस्तेमाल उत्पाद की रंगत, गाढ़ापन या बनावट बदलने के लिए किए जाने का आरोप है.
खाद्य आयुक्त डॉ. रोशन जैकब के स्तर से जारी निर्देशों के मुताबिक, यदि किसी निर्माण इकाई में खतरनाक रसायन या विजातीय वसा मिलती है तो कार्रवाई संबंधित उत्पाद तक सीमित नहीं रहेगी. खाद्य सुरक्षा कानून की धारा 34 के तहत उत्पादन रोकने का आदेश दिया जा सकता है. पुष्टि होने पर प्रतिष्ठान का खाद्य लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर संबंधित ब्रांड की बिक्री पूरे उत्तर प्रदेश में रोकी जा सकती है.
सरकार ने दूसरे राज्यों से उत्तर प्रदेश में पहुंचने वाले दुग्ध उत्पादों को लेकर भी सख्ती का संकेत दिया है. यदि बाहर निर्मित किसी ब्रांड के दूध, पनीर, खोवा, क्रीम या अन्य उत्पाद में हानिकारक रसायन अथवा विजातीय वसा की पुष्टि होती है, तो प्रदेश में उसकी बिक्री पर रोक लगाई जा सकती है. इससे बाहरी कंपनियों और सप्लायरों पर भी खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करने का दबाव बढ़ेगा.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि जनस्वास्थ्य के लिए खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल सुनियोजित या संगठित तरीके से होता पाया गया, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई जा सकती है. आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है. इससे मिलावट के मामलों में सिर्फ आर्थिक दंड के बजाय उत्पादन, लाइसेंस और पूरी सप्लाई चेन तक कार्रवाई का रास्ता खुल गया है.