बेटा जैविक नहीं तो क्या हुआ? हाई कोर्ट ने कम्पेशनेट अपॉइंटमेंट पर विभाग को लगाई फटकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामले में मोहम्मद अली के पक्ष में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कैट का आदेश रद्द करते हुए विभाग पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया और दावे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया.

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Meenu Singh

प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए परिवार की आर्थिक जरूरत को प्राथमिकता देने की बात कही है. मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश को निरस्त कर दिया. कैट ने मोहम्मद अली को यह कहते हुए नियुक्ति से वंचित किया था कि वह मृत कर्मचारी का जैविक पुत्र नहीं है और उसका वैध दत्तक ग्रहण भी साबित नहीं हुआ है.

2014 में पिता की मौत के बाद शुरू हुई परेशानी

जौनपुर निवासी मोहम्मद अली के पिता अनवर अली उत्तर मध्य रेलवे में सफाई कर्मचारी थे. 9 मई 2014 को उनका निधन हो गया था. परिवार में पत्नी, तीन विवाहित बेटियां और एक नाबालिग बेटा था. मोहम्मद अली के बालिग होने के बाद उसकी मां ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए विभाग से संपर्क किया. जांच में सामने आया कि मोहम्मद अली जैविक संतान नहीं था और नवजात अवस्था में ट्रेन यात्रा के दौरान मिला था.

दस्तावेजों में दर्ज था बेटे का रिश्ता

विभाग ने इसी आधार पर नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया. बाद में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने भी परिवार को राहत नहीं दी. मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो पीठ ने विभिन्न दस्तावेजों पर ध्यान दिया. मोहम्मद अली का नाम पिता के सेवा अभिलेख, हाईस्कूल प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र, आधार, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और जाति प्रमाणपत्र में पुत्र के रूप में दर्ज था. कोर्ट ने इन दस्तावेजों को मामले में महत्वपूर्ण माना.


आर्थिक संकट दूर करना है नियुक्ति का उद्देश्य

हाई कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है. इसलिए विभागीय जांच का केंद्र परिवार की वास्तविक स्थिति और आश्रित सदस्यों की संख्या होनी चाहिए. पीठ ने माना कि जांच को जन्म संबंधी सवालों तक ले जाना इस मामले में उचित नहीं था. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला कानूनी रूप से गोद लेने का नहीं था, इसलिए वैध दत्तक ग्रहण का प्रमाण मांगना उचित आधार नहीं बन सकता.

रेल विभाग पर लगाया 25 हजार रुपये का हर्जाना

पीठ ने विभाग के रवैये को हठधर्मी बताते हुए 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया. कोर्ट ने कहा कि मोहम्मद अली और उसकी मां वर्ष 2014 से न्याय के लिए प्रयास कर रहे हैं. अदालत ने छह फरवरी 2026 को कैट की ओर से दिए गए आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही विभाग को निर्देश दिया कि वह निर्धारित समय में मामले पर दोबारा विचार करे और सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उचित फैसला ले.

6 सप्ताह में दावे पर फिर से करना होगा विचार

हाई कोर्ट ने विभाग को छह सप्ताह के भीतर तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश दिया है. अदालत ने साफ किया कि अब केवल इस आधार पर मोहम्मद अली का दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि वह ट्रेन में मिला था या अनवर अली की जैविक संतान नहीं था. इस फैसले से अनुकंपा नियुक्ति में परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति और उपलब्ध दस्तावेजों के महत्व को लेकर महत्वपूर्ण दिशा सामने आई है.