मुस्लिम भी नहीं कर सकते 18 साल से कम उम्र की लड़की से निकाह: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र की मुस्लिम लड़की का निकाह भी कानूनन मान्य नहीं माना जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट और बाल विवाह निषेध कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होते हैं.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाल विवाह से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि देश में लागू कानून किसी भी व्यक्तिगत धार्मिक कानून से ऊपर हैं. अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर कम उम्र में निकाह की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह बाल विवाह निषेध कानून और POCSO एक्ट के प्रावधानों के विपरीत है.
बाल विवाह पर अदालत का स्पष्ट रुख
इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और POCSO एक्ट पूरे देश में समान रूप से लागू होते हैं. अदालत ने माना कि किसी भी धर्म का पर्सनल लॉ इन कानूनों के प्रभाव को कम नहीं कर सकता. न्यायालय ने कहा कि यदि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह कराया जाता है, तो इससे POCSO कानून के उल्लंघन की आशंका पैदा होती है, क्योंकि विवाह के बाद वैवाहिक संबंध स्थापित होना स्वाभाविक माना जाता है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, बच्चों की सुरक्षा और राष्ट्रीय नीति से जुड़े ऐसे कानूनों को किसी धार्मिक परंपरा के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता. इसलिए सभी नागरिकों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु का पालन अनिवार्य है.
बुलंदशहर की घटना से जुड़ा था विवाद
यह मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुई एक घटना से जुड़ा है. पुलिस और प्रशासन की टीम एक 16 वर्षीय मुस्लिम किशोरी का बाल विवाह रुकवाने पहुंची थी. आरोप है कि कार्रवाई के दौरान कुछ लोगों ने सरकारी टीम का विरोध किया और उनके काम में बाधा डाली. इसके बाद पुलिस ने 19 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. आरोपियों ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर रद्द करने की मांग की. उनका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार युवती के बालिग होने की धार्मिक अवधारणा अलग है और उसी आधार पर निकाह वैध माना जाना चाहिए. हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि भारतीय कानून के सामने ऐसा तर्क टिक नहीं सकता.
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एफआईआर रद्द करने से इनकार, कानून का पालन जरूरी
हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में जांच योग्य तथ्य मौजूद हैं. अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि बचाव दल के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, उन्हें धमकाया गया और लड़की को उनकी निगरानी से हटाने का प्रयास भी हुआ. न्यायालय ने यह भी कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों का अध्ययन करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि बाल विवाह पर रोक लगाने वाला कानून और POCSO एक्ट सर्वोपरि हैं. भारत में वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष निर्धारित है. यदि इन प्रावधानों का उल्लंघन होता है तो संबंधित लोगों के खिलाफ जेल और जुर्माने जैसी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.