समाज में किसी भी व्यक्ति को उसके जाति के नाम पर बुलाना अपराध माना जाता है. इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम से जुड़े एक मामले में सुनवाई के दौरान बड़ी बात कही है.
अदालत की ओर से कहा गया कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति से संबोधित करना या उसे पुकारना अपराध नहीं है. लेकिन अग उस वक्त व्यक्ति का जानबूझकर अपमान करना या धमकाने की मंशा हो तो यह गलत और अपराध माना जाएगा.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने अमय पांडे और तीन अन्य अपीलकर्ताओं की आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान यह बात कही है. अपीलकर्ताओं का कहना है कि उनके उपर 2019 में एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज किया गया था. उन्होंने ट्रायल कोर्ट द्वारा जुलाई 2025 में जारी समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी. यह मामला एक शादी समारोह के दौरान हुई कथित बहस से जुड़ा है.
पुलिस द्वारा दायर प्रारंभिक एफआईआर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई थी, जिसमें सामान्य बहस और अस्पष्ट हमले का जिक्र था. उसमें जातिगत गाली-गलौज या एससी/एसटी एक्ट से जुड़ा कोई आरोप नहीं था. बाद में शिकायतकर्ता द्वारा जोड़े गए बयान में नई कहानी सामने आई, जिसमें जाति-आधारित दुर्व्यवहार और हमले का दावा किया गया. बाद में शिकायतकर्ता ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अपीलकर्ताओं की पहचान बताई.
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला विरोधाभासी और दुर्भावनापूर्ण है. मामला दर्ज करने के बाद बयानों में काफी अंतर है. मेडिकल रिपोर्ट में शिकायतकर्ता की चोटें मामूली बताई गई हैं, जो घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने का संकेत देती हैं. वकील ने तर्क दिया कि एससी/एसटी एक्ट लगाने के लिए जरूरी तत्व यानी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान या धमकी इस मामले में मौजूद नहीं हैं.
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई विसंगतियां हैं. अदालत ने दोनों पक्षों के बीच निजी विवाद की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत कथित अपराधों की सच्चाई पर गंभीर संदेह है. इसलिए अभियोजन पक्ष को यह यह साबित करना होगा कि आरोपी ने पीड़ित को जानबूझकर अपमानित किया या धमकाया हो. इसके बाद अदालत ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन और कार्यवाही को रद्द कर दिया. हालांकि, भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत मामला आगे बढ़ सकता है.