मरकर भी लोगों के लिए बनी वरदान... सड़क हादसे में 18 वर्षीय सुरिंदर कौर का निधन; मां ने बेटी के अंगदान का लिया फैसला
सड़क हादसे में 18 वर्षीय सुरिंदर कौर की जान चली गई, लेकिन उनकी मां संतोष कौर ने दुख के बीच ऐसा फैसला लिया, जिसने बेटी को अमर कर दिया.
चंडीगढ़: सड़क हादसे में 18 वर्षीय सुरिंदर कौर की जिंदगी भले ही खत्म हो गई, लेकिन उनके अंग अब दूसरे लोगों के जीवन को नई उम्मीद दे रहे हैं. मोहाली के खरड़ स्थित गांव तेउर की रहने वाली सुरिंदर 23 अगस्त को सड़क हादसे के बाद गंभीर हालत में पीजीआई में भर्ती हुई थीं. इलाज के दौरान 25 अगस्त को चिकित्सकीय समिति ने उन्हें ब्रेन स्टेम डेड घोषित किया. इसके बाद उनकी मां संतोष कौर ने बेटी के अंगदान का फैसला लिया.
मां ने लिया बड़ा फैसला
मां के इस फैसले के बाद सुरिंदर की दोनों किडनियां, अग्न्याशय और दोनों कार्निया दान किए गए. एक किडनी और अग्न्याशय का एक साथ प्रत्यारोपण 31 वर्षीय मरीज में किया गया. दूसरी किडनी 15 वर्षीय मरीज को दी गई. दोनों कार्निया दो मरीजों के लिए इस्तेमाल किए गए हैं, जिनसे उनकी आंखों की रोशनी लौटने की उम्मीद है. इस तरह सुरिंदर की मौत के बाद भी उनके अंग कई परिवारों के लिए उम्मीद की वजह बन गए.
बेटी को खोने के बाद मां ने दिखाई हिम्मत
सुरिंदर को वापस न ला पाने का दर्द उनकी मां के लिए बेहद कठिन था. इसके बावजूद संतोष कौर ने अंगदान के लिए सहमति दी. उनका कहना था कि बेटी को वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन अगर उसके शरीर का कोई हिस्सा किसी दूसरे इंसान की जिंदगी बचाने में काम आए, तो इससे उसके जीवन को एक नया अर्थ मिल सकता है. मां के इसी फैसले ने दुख की घड़ी को मानवता की मिसाल में बदल दिया.
31 वर्षीय मरीज को एक साथ मिले दो अंग
दान की गई एक किडनी और अग्न्याशय को 31 वर्षीय मरीज में एक साथ प्रत्यारोपित किया गया. इसे एक साथ अग्न्याशय-किडनी प्रत्यारोपण कहा जाता है. खास बात यह है कि इस मरीज को पहले भी अपनी मां से किडनी मिली थी, लेकिन कुछ समय बाद वह काम करना बंद कर चुकी थी. इसके बाद सुरिंदर के अंगों ने इस मरीज के इलाज में नई संभावना पैदा की.
15 वर्षीय मरीज को मिली दूसरी किडनी
सुरिंदर की दूसरी किडनी 15 वर्षीय मरीज में प्रत्यारोपित की गई. वहीं दोनों कार्निया अलग-अलग मरीजों के लिए सुरक्षित किए गए. चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद इनसे दो लोगों की दृष्टि लौटने की उम्मीद है. अंगदान के इस फैसले ने दिखाया कि किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसके अंग दूसरे लोगों के लिए जीवन का सहारा बन सकते हैं. सुरिंदर का परिवार अब इसी उम्मीद के साथ उनके फैसले को याद कर रहा है.
कई घंटे चली जटिल चिकित्सा प्रक्रिया
अंगों को निकालने और प्रत्यारोपण की पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल थी. किडनी और अग्न्याशय का एक साथ प्रत्यारोपण करने वाली सर्जरी करीब 13 घंटे चली. अलग-अलग चिकित्सा दलों ने मिलकर लगभग 18 घंटे तक काम किया. इस दौरान अंगों को सुरक्षित रखने से लेकर उन्हें जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने तक कई चरणों को पूरा किया गया. इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य अधिक से अधिक मरीजों को जीवन की नई संभावना देना था.
सुरिंदर की कहानी के साथ सामने आई दूसरी मिसाल
इसी बीच चंडीगढ़ की नूर ने कैंसर मरीजों के लिए दूसरी बार अपने बाल दान किए. उनका कहना है कि कैंसर के इलाज के दौरान बाल झड़ने से मरीजों को अकेलापन महसूस नहीं होना चाहिए. इसलिए वह इस पहल को जारी रखना चाहती हैं. नूर का मानना है कि समाज को कैंसर से जूझ रहे लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए. सुरिंदर की मां और नूर की पहल अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों कहानियां इंसानियत और दूसरों के लिए कुछ करने का संदेश देती हैं.