बठिंडा कस्टोडियल डेथ केस में बड़ा एक्शन, इंस्पेक्टर समेत 5 पुलिसकर्मियों पर हत्या का आरोप तय
बठिंडा के चर्चित हिरासत मौत मामले में अदालत ने इंस्पेक्टर समेत पांच पुलिसकर्मियों पर हत्या, साक्ष्य मिटाने और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से छेड़छाड़ के आरोप तय किए हैं. मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी.
बठिंडा के बहुचर्चित कथित हिरासत मौत मामले में जिला अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पंजाब पुलिस के पांच कर्मियों के खिलाफ गंभीर आरोप तय कर दिए हैं. इनमें तत्कालीन सीआइए-1 प्रभारी इंस्पेक्टर नवप्रीत सिंह भी शामिल हैं. अदालत ने हत्या, साक्ष्य नष्ट करने, अपराधियों को बचाने के लिए झूठी जानकारी देने और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में छेड़छाड़ जैसे आरोपों पर सुनवाई आगे बढ़ाने का आदेश दिया है. अब इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू होगी और अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्य पेश करेगा.
अदालत ने तय किए गंभीर आरोप
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बलविंदर कुमार की अदालत ने पांचों आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए हैं. अदालत ने माना कि मामले की सुनवाई के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं. अब अभियोजन पक्ष 27 नवंबर को अदालत में अपने सबूत पेश करेगा, जिसके बाद मामले की अगली प्रक्रिया शुरू होगी.
मामला कैसे शुरू हुआ?
यह मामला अक्टूबर 2024 में गांव लखी जंगल निवासी भिंदर सिंह की संदिग्ध मौत से जुड़ा है. पुलिस का कहना था कि अवैध हथियार मामले में तलाश के दौरान वह पुलिस टीम को देखकर थर्मल प्लांट की झील में कूद गया था. बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.
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परिवार ने लगाया हिरासत में यातना का आरोप
मृतक के भाई सतनाम सिंह ने पुलिस की कहानी को गलत बताते हुए आरोप लगाया कि भिंदर सिंह को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था. उनका कहना था कि पूछताछ के दौरान दी गई यातनाओं के कारण उसकी मौत हुई. परिवार ने शुरू से ही निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी.
न्यायिक जांच में उठे बड़े सवाल
न्यायिक जांच में फोरेंसिक सबूतों, मेडिकल रिपोर्ट और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर डूबने से मौत के दावे पर सवाल उठाए गए. जांच रिपोर्ट में कहा गया कि मृतक को कथित तौर पर वाटरबोर्डिंग जैसी यातना दी गई थी और बाद में घटना को दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की गई. रिपोर्ट में अवैध हिरासत का भी उल्लेख किया गया.
पोस्टमार्टम में देरी
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि घटना वाले दिन मृतक और तत्कालीन सीआइए प्रभारी के मोबाइल फोन एक ही इलाके में सक्रिय थे. पोस्टमार्टम दो दिन तक टाले जाने पर भी सवाल उठाए गए. रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि परिजनों पर दबाव बनाने के लिए यह देरी की गई. अब अदालत में पेश होने वाले साक्ष्यों पर सभी की नजरें टिकी हैं.