दशकों तक संग्रहालय में पड़ी रही ये मूर्ति, अब सामने आया भारतीय संगीत का 1800 साल पुराना इतिहास

मध्य प्रदेश के उज्जैन संग्रहालय में रखी करीब 1800 साल पुरानी सरस्वती की मूर्ति चर्चा में है. मनासा से मिली इस मूर्ति में देवी सरस्वती के साथ घुमावदार और हार्प जैसी वीणा दिखाई देती है. पुरातत्व सर्वे में इसे मालव काल की दूसरी सदी ईस्वी की मूर्ति माना गया है.

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Babli Rautela

मध्य प्रदेश के नीमच जिले के मनासा से मिली करीब 1800 साल पुरानी देवी सरस्वती की एक मूर्ति ने भारतीय संगीत की प्राचीन परंपरा को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है. काले बलुआ पत्थर से बनी यह छोटी सी मूर्ति लंबे समय से उज्जैन संग्रहालय में रखी हुई थी, लेकिन अब इसके ऐतिहासिक महत्व पर नए सिरे से ध्यान दिया जा रहा है. करीब 30 सेंटीमीटर ऊंची इस मूर्ति की खासियत देवी सरस्वती की आकृति के साथ दिखाई देने वाला वाद्य यंत्र है. इसमें एक घुमावदार और हार्प जैसी वीणा नजर आती है, जो उस समय के संगीत और वाद्य परंपरा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती है.

दशकों तक संग्रहालय में रखी रही मूर्ति

यह मूर्ति 1980 के दशक में नीमच के मनासा इलाके से मिली थी. इसके बाद इसे उज्जैन संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया. लंबे समय तक यह संग्रहालय के रिकॉर्ड में केवल 78 नंबर के साथ दर्ज रही. हाल ही में पुरातत्व आयुक्त मदन कुमार ने संग्रहालय का दौरा किया. इस दौरान क्यूरेटर योगेश पाल ने उनका ध्यान इस प्राचीन मूर्ति की ओर दिलाया. इसके बाद मूर्ति को लेकर विशेषज्ञों की रुचि बढ़ी और इसके ऐतिहासिक महत्व की जांच शुरू हुई. पुरातत्व विभाग ने मध्य प्रदेश के अलग अलग संग्रहालयों में रखी सरस्वती की मूर्तियों का मूर्ति कला संबंधी सर्वे किया. इस अध्ययन के बाद माना गया कि यह मूर्ति मालव काल से जुड़ी है और दूसरी सदी ईस्वी की हो सकती है.

सरस्वती की सबसे पुरानी मूर्तियों में शामिल

सर्वे के दौरान सामने आया कि यह मध्य प्रदेश में मिली सरस्वती की सबसे पुरानी मूर्ति है जिसमें किसी वाद्य यंत्र को भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे केवल धार्मिक मूर्ति नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय संगीत की परंपरा को समझने वाला महत्वपूर्ण प्रमाण भी मान रहे हैं. मूर्ति में दिखाई देने वाला वाद्य यंत्र उस दौर में संगीत के विकास और कलाकारों की कल्पना की झलक देता है. इस मूर्ति में देवी सरस्वती के साथ दिखाई गई वीणा ने विशेषज्ञों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा है. भारतीय कला और मूर्तिकला में वीणा का संबंध काफी पुराना माना जाता है.


प्राचीन गुफाओं में मिले चित्रों और मूर्तियों से लेकर बाद के ऐतिहासिक प्रमाणों तक वीणा के अलग अलग रूप दिखाई देते हैं. इससे पता चलता है कि भारतीय संगीत में तार वाले वाद्य यंत्रों की परंपरा काफी पुरानी रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी इसी तरह के प्राचीन तार वाले वाद्य यंत्रों की परंपरा दिखाई देती है. म्यांमार में आज भी हार्प जैसा एक वाद्य यंत्र बजाया जाता है, जिसे साउंग गौक कहा जाता है.

समुद्रगुप्त के सिक्कों में भी दिखती है वीणा

प्राचीन भारतीय संगीत से जुड़े प्रमाणों में समुद्रगुप्त के सोने के सिक्के भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इन सिक्कों में समुद्रगुप्त को एक वीणा जैसे वाद्य यंत्र को बजाते हुए दिखाया गया है. इन सिक्कों का समय चौथी सदी ईस्वी का माना जाता है. इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में वीणा जैसे तार वाले वाद्य यंत्रों की परंपरा काफी लंबे समय से मौजूद थी. नई मिली जानकारी के साथ सरस्वती की यह प्राचीन मूर्ति इस परंपरा की एक और महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जा रही है.