कमल, शंख और ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’... भोजशाला सर्वे में ASI को क्या मिला जिसने बदल दिया पूरा केस?
एमपी के धार में भोजशाला मंदिर का ASI ने सर्वेक्षण किया था. इस डीटेल्ड सर्वे के आधार पर आज एमपी हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने फैसला सुनाया है, कोर्ट ने कहा कि भोजशाला मंदिर है.
धार: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने मध्य प्रदेश के धार जिले के भोजशाला-कमाल मौला परिसर का डीटेल्ड साइंटिफिक सर्वे करके मामले में एक अहम भूमिका निभाई है. ASI की रिपोर्ट के आधार पर0 मध्य प्रदेश हाइकोर्ट की इंदौर बेंच ने इस जगह को देवी वाग्देवी सरस्वती से जुड़ा एक मंदिर घोषित कर दिया है.
रिपोर्ट्स के अनुसार ASI ने लगभग 98 दिनों तक सर्वेक्षण करने के उच्च न्यायालय को लगभग 2,100 पन्नों की एक डीटेल्ड रिपोर्ट सौंपी थी. खुदाई और निरीक्षण के दौरान सर्वेक्षण टीम को कई ऐतिहासिक वस्तुएं और आर्किटेक्चरल क्लू मिले थे जिनसे पता चलता था कि इस जगह पर पहले एक प्राचीन मंदिर मौजूद था.
मंदिर होने के मिले थे कई सबूत
ASI को परिसर के अंदर कमल के फूल, शंख, मूर्तियां, सिक्के और तराशे हुए पत्थरों जैसे प्रतीक मिले थे. ये प्रतीक आमतौर पर हिंदू मंदिर वास्तुकला और परंपराओं से जुड़े होते हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि एक पुरानी परमार-युग के स्ट्रक्चर के नींव के पत्थरों का उपयोग बाद के निर्माण कार्यों में किया गया था. विशेषज्ञों ने पाया कि कई खंभे और वास्तुशिल्प तत्व किसी पुराने मंदिर के लगत थे जिनका बाद में मस्जिद के ढांचे में फिर से उपयोग किया गया है.
हिंदू देवी देवताओं की नक्काशी भी मिली
सर्वे के दौरान ASI टीम को परिसर की दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की नक्काशी और आकृतियां भी मिलीं थी. हिंदू संस्कृति से जुड़ी कई मूर्तियों को पहले ही सुरक्षा और संरक्षण के लिए इस यहां से मांडू म्यूजियम में पहुंचा दिया गया था. ये कलाकृतियां संगमरमर, बलुआ पत्थर, चूना पत्थर और नरम पत्थर जैसे मटेरियल से बनी थीं. इन नक्काशियों में भगवान गणेश, नरसिंह, भैरव, अन्य देवी-देवताओं और जानवरों से संबंधित चित्र और सिंबल शामिल थे.
शिलालेखों पर लिखे थे मंत्र
रिपोर्ट में के महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक, 'ॐ सरस्वत्यै नमः' शिलालेख वाले दो खंभों की खोज थी. एक खंभे पर एक देवी की आकृति भी बनी हुई थी. परिसर के एक अन्य क्षेत्र में शोधकर्ताओं को एक बड़ा शिलालेख भी मिला था जिसमें प्राकृत भाषा में लिखी दो कविताएं थीं, जिनमें से प्रत्येक में 109 छंद थे. इसके साथ ही रिपोर्ट में कहा गया कि कई वास्तुशिल्प विशेषताएं, जिनमें तराशे हुए चबूतरे और सजावटी पत्थर के ढांचे शामिल हैं पारंपरिक मंदिर निर्माण शैली से मेल खाते हैं.
इसी के आधार पर ASI ने यह निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान ढांचे के निर्माण के दौरान एक पुराने मंदिर के कुछ हिस्सों का फिर से उपयोग किया गया था. ब्रिटिश शासन के दौरान किए गए ऐतिहासिक सर्वेक्षणों और 1987 में हुई पिछली खुदाई ने भी इस जगह पर हिंदू धार्मिक अवशेषों की मौजूदगी की पुष्टि की है.