'एक कचौरी, दो समोसा...', दिल्ली प्रोटेस्ट में महिलाओं की बड़ी भागीदारी; नारा लगाकार उठाए गंभीर सवाल

दिल्ली में महिला सुरक्षा और आजादी को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में युवतियां नए अंदाज में अपनी बात रख रही हैं. पोस्टरों और नारों में गुस्से के साथ व्यंग्य और तंज का इस्तेमाल भी देखने को मिल रहा है. सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के ये स्लोगन तेजी से चर्चा में हैं.

ANI
Shanu Sharma

महिला सुरक्षा और आजादी के मुद्दे पर दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर हो रहे प्रदर्शनों में युवतियों की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है. जंतर-मंतर से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी और पंजाब तक प्रदर्शनकारी महिलाएं अपनी आवाज उठा रही हैं. खास बात यह है कि इन प्रदर्शनों में युवा पीढ़ी के साथ नई पीढ़ी की लड़कियों की मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी हुई है.

प्रदर्शन के दौरान हाथों में नजर आने वाले पोस्टर और लगाए जा रहे नारे सोशल मीडिया पर भी तेजी से साझा किए जा रहे हैं. इन नारों में पारंपरिक विरोध के अंदाज से अलग व्यंग्य, तंज और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है.

केवल नारा नहीं गंभीर सवाल

प्रदर्शन में सुनाई देने वाले कई नारे पहली नजर में हल्के-फुल्के या मजाकिया लग सकते हैं, लेकिन इनके जरिए महिला सुरक्षा, स्वतंत्रता और सामाजिक सोच से जुड़े गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं. इनमें 'क्यूटी नहीं हूं, क्रांति हूं', 'हम आजाद हैं, सिर्फ पन्नों पर' और 'हम औरतें अपने आप की, ना किसी के बाप की' जैसे नारे शामिल हैं. वहीं कुछ नारों में पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था पर सीधे तंज किया गया है. इसके अलावा 'एक कचौरी, दो समोसा... इन मर्दों का क्या भरोसा', एक सुट्टा दो चाय... मर्द जात हाय-हाय!' और 'शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में' जैसे स्लोगन इसी अंदाज को दिखाते हैं.


प्रदर्शन के दौरान महिलाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. हक की दावेदारी है, सारी रात हमारी है!' और 'नहीं डरेंगे डर के, मर्द को रखो घर में!' जैसे नारे इसी संदेश को सामने रखते हैं. वहीं 'सिमरन कब जिएगी जिंदगी?' जैसे नारे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिलाओं के अपने तरीके से जीवन जीने के अधिकार पर सवाल खड़े करते हैं.

बारिश में भी जारी रहा प्रदर्शन

दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन के दौरान बारिश के बीच भी प्रदर्शनकारी इन नारों को दोहराते नजर आए. इन नारों की खासियत यह है कि इनमें विरोध की गंभीरता के साथ भाषा का हल्का और व्यंग्यात्मक अंदाज भी दिखाई देता है. प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, छोटे और आसानी से याद रहने वाले ये स्लोगन सोशल मीडिया पर तेजी से लोगों तक पहुंच रहे हैं. यही वजह है कि महिला सुरक्षा और आजादी से जुड़े इन प्रदर्शनों में नारों की भाषा भी चर्चा का एक अलग विषय बन गई है.