पाताल लोक की ओर जा रही देश की राजधानी! अगले 30 सालों में हजारों इमारतों के ढहने का खतरा, चौंकाने वाला खुलासा
देश की राजधानी दिल्ली पर्यावरणीय संकट के एक नए और बेहद गंभीर दौर में प्रवेश कर चुकी है. वायु प्रदूषण, जल संकट और गर्मी की मार झेलने के बाद अब यह महानगर जमीन धंसाव यानी लैंड सब्सिडेंस के खतरे से दो-चार हो रहा है.
नई दिल्ली: एक नई शोध रिपोर्ट ने लोगों में डर पैदा कर दिया है. इस बार 17 लाख लोगों की जान जोखिम में है. देश की राजधानी दिल्ली पर्यावरणीय संकट के एक नए और बेहद गंभीर दौर में प्रवेश कर गई है. वायु प्रदूषण, जल संकट और गर्मी की मार झेलने के बाद अब यह महानगर जमीन धंसाव यानी लैंड सब्सिडेंस के खतरे से दो-चार हो रहा है.
नेचर जर्नल में प्रकाशित एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने यह खुलासा किया है कि दिल्ली की जमीन सालाना 51 मिलीमीटर तक धंस रही है, जिससे 17 लाख से अधिक लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है. अध्ययन में बताया गया कि दिल्ली में 2,264 इमारतें पहले से ही गंभीर संरचनात्मक जोखिम (High Structural Risk) की श्रेणी में पहुंच चुकी हैं.
यह रिपोर्ट “Building Damage Risk in Sinking Indian Megacities” शीर्षक से प्रकाशित हुई है, जिसे कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, वर्जीनिया टेक और कनाडा स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है. शोध में वर्ष 2015 से 2023 तक के InSAR (Interferometric Synthetic Aperture Radar) उपग्रह डाटा का विश्लेषण किया गया है, जिसके आधार पर पाया गया कि दिल्ली की भूमि धंसने की रफ्तार चिंताजनक स्तर तक बढ़ गई है.
खतरे में हजारों इमारतें
अध्ययन के अनुसार, भारत के पांच प्रमुख महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु में भूमि धंसाव का खतरा तेजी से फैल रहा है. इनमें दिल्ली तीसरे स्थान पर है, जहां 196.27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र इस संकट की चपेट में है. मुंबई (262.36 वर्ग किमी) और कोलकाता (222.91 वर्ग किमी) इससे आगे हैं.
एनसीआर के कई हिस्सों में यह स्थिति और भी भयावह है. रिपोर्ट में बताया गया कि फरीदाबाद में भूमि प्रति वर्ष 38.2 मिलीमीटर, बिजवासन में 28.5 मिलीमीटर और गाजियाबाद में 20.7 मिलीमीटर की दर से धंस रही है. वहीं, दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में कुछ इलाकों में जमीन 15.1 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से ऊपर उठती भी देखी गई है, जो भौगोलिक असंतुलन का संकेत देती है.
अध्ययन के मुताबिक, यदि मौजूदा रफ्तार से भूमि धंसाव जारी रहा तो अगले 30 वर्षों में दिल्ली में 3,169 इमारतें अत्यधिक जोखिम वाले दायरे में होंगी. वहीं, अगले 50 साल में यह संख्या बढ़कर 11,457 तक पहुंच सकती है. इस संकट का असर केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़क, पुल, मेट्रो लाइन और जलापूर्ति जैसे पूरे शहरी बुनियादी ढांचे पर गहरा असर डालेगा.
तीन बड़ी वजहें
शोध में वैज्ञानिकों ने दिल्ली और अन्य महानगरों में भूमि धंसाव की तीन मुख्य वजहें बताई हैं -
- भूजल का अत्यधिक दोहन: दिल्ली में हर साल लाखों लीटर भूजल निकाला जा रहा है. इस अनियंत्रित दोहन से भूमिगत एक्विफर खाली हो रहे हैं और जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) सिकुड़ने लगी है. जब पानी निकल जाता है तो मिट्टी के कण आपस में सघन हो जाते हैं, जिससे जमीन नीचे धंसती जाती है.
- मानसून की अनियमितता: दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वर्षा का पैटर्न लगातार बदल रहा है. बारिश में देरी, अल्पवर्षा और अचानक बाढ़ जैसे चरम मौसमी बदलावों ने भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्राकृतिक प्रक्रिया को प्रभावित किया है.
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change): बढ़ते तापमान और मौसम की चरम स्थितियों ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है. विशेषज्ञों के अनुसार, क्लाइमेट चेंज से उत्पन्न असंतुलन के कारण भूमि धंसाव, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं एक-दूसरे से जुड़कर “शहरी विनाश का चक्र” बना रही हैं.
भविष्य का डरावना परिदृश्य
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहा, तो दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले 17 लाख से अधिक लोग सीधे खतरे के दायरे में होंगे. कई बहुमंजिला इमारतों की नींव कमजोर पड़ सकती है, सड़कें दरक सकती हैं, और मेट्रो या फ्लाईओवर जैसी संरचनाएं भी जोखिम में आ सकती हैं.
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि पारंपरिक सर्वे तकनीकों से धंसाव का सही आकलन करना कठिन है. हर दरार धंसाव का संकेत नहीं होती, और दरार न होना भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है. इसलिए उन्होंने सरकार को सलाह दी है कि भू-धंसाव और संरचनात्मक क्षति का एक मानकीकृत व डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाए, ताकि समय रहते नीति-निर्माण और रोकथाम के उपाय किए जा सकें.
कदम उठाने का समय अब
दिल्ली पहले ही प्रदूषण, जल संकट और आबादी के दबाव से जूझ रही है. ऐसे में भूमि धंसाव का यह नया खतरा स्थिति को और जटिल बना सकता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि भूजल प्रबंधन को लेकर तत्काल सख्त नीतियां बनानी होंगी. वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य और प्रभावी बनाना, शहरी हरित क्षेत्र बढ़ाना, और एकीकृत जल नीति तैयार करना इस संकट को रोकने के लिए जरूरी कदम हैं.
इसके साथ ही निर्माण कार्यों में भूगर्भीय सर्वे को अनिवार्य करना, और धंसाव-प्रवण इलाकों में नई इमारतों की स्वीकृति पर सख्त नियम लागू करने की सिफारिश की गई है. दिल्ली का यह “पाताल लोक” संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है. अगर अब भी नीति-निर्माता और नागरिक नहीं जागे, तो आने वाले दशकों में राजधानी का बड़ा हिस्सा सचमुच जमीन में समा सकता है. वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं, अब जरूरत है निर्णायक कार्रवाई की.