IPL का खुमार हर साल फैंस के सिर चढ़कर बोलता है. हर सीजन की शुरुआत में दिल्ली के फैंस 'ई साला कप नामदे' वाले जज्बे के साथ अपनी टीम का सपोर्ट करते हैं. दिल्ली के इतिहास में शुरू में फैंस के अंदर एक अलग जज्बा रहता है, लेकिन टूर्नामेंट के अंत तक फैंस का दिल टूट जाता है. 17 साल हो गए, कहानी नहीं बदली DD से DC तक, दिल्ली की टीम हमेशा शुरू में शेर, फिर हो जाती है ढेर. आईए जानते हैं कि दिल्ली डेयरडेविल्स से लेकर दिल्ली कैपिटल्स तक, इस फ्रेंचाइजी का सफर शुरुआती मैचों में शानदार जीत और टूर्नामेंट के बीच में आते-आते ताश के पत्तों की तरह कैसे बिखर जाता है.
साल 2008 में आईपीएल शुरू हुआ, तो वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर और एबी डिविलियर्स जैसे सितारों से सजी दिल्ली डेयरडेविल्स सबसे खतरनाक टीम मानी जाती थी. 2008 और 2009 में टीम ने शानदार खेल दिखाते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया. 2012 में भी टीम प्लेऑफ में पहुंची, लेकिन इन तीन सीजनों को छोड़ दें, तो डेयरडेविल्स का सफर बेहद शर्मनाक रहा. अक्सर टीम शुरुआती 5-6 मैचों में टॉप-4 में रहती थी, लेकिन फिर लगातार हार का ऐसा सिलसिला शुरू होता था कि टीम सीधे अंक तालिका में सबसे नीचे जाकर रुकती थी.
2019 में फ्रेंचाइजी ने नाम बदलकर दिल्ली कैपिटल्स कर दिया. श्रेयस अय्यर और ऋषभ पंत जैसे युवा खिलाड़ियों ने टीम में नई जान फूंकी. 2019, 2020 (पहली बार फाइनल) और 2021 में टीम ने लगातार प्लेऑफ खेला. लगा कि अब दिल्ली का सूखा खत्म होगा.
2022 से लेकर अब तक, दिल्ली फिर से अपने उसी पुराने ढंग पर लौट आई है. सीजन के पहले हाफ में टीम शानदार चेज करती है. बड़े स्कोर बनाती है, लेकिन जैसे ही टूर्नामेंट अपने अहम मोड़ पर पहुंचता है, टीम का मिडिल ऑर्डर और डेथ बॉलिंग पूरी तरह फ्लॉप हो जाती है.
1. टॉप करके फ्लॉप: दिल्ली ने 2009, 2012 और 2021 में पॉइंट्स टेबल में पहला स्थान हासिल किया था. नियम के मुताबिक टॉप-2 टीमों को फाइनल में जाने के दो मौके मिलते हैं, लेकिन दिल्ली इन तीनों ही सालों में अपने दोनों क्वालीफायर मैच हारकर बाहर हो गई.
2. धोनी की CSK से सबसे ज्यादा खौफ: प्लेऑफ में दिल्ली को सबसे ज्यादा दर्द चेन्नई सुपर किंग्स ने दिया है. 2012 और 2019 के अहम क्वालीफायर 2 मुकाबलों में चेन्नई ने ही दिल्ली का सफर खत्म किया था.
3. इकलौता फाइनल: 2020 में टीम पहली बार फाइनल में पहुंची थी, लेकिन वहां मुंबई इंडियंस के अनुभव के आगे उनकी एक न चली.
1. कंसिस्टेंसी की कमी: दिल्ली के बल्लेबाज एक मैच में शतक मारते हैं, तो अगले तीन मैचों में सिंगल डिजिट पर आउट होते हैं.
2. प्रेशर हैंडलिंग: जब 'करो या मरो' वाले मुकाबले आते हैं, तो टीम पैनिक कर जाती है.
3. प्लेइंग-11 में लगातार बदलाव: हार के डर से दिल्ली अक्सर अपने विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ छेड़छाड़ करती है, जिससे खिलाड़ियों का आत्मविश्वास गिरता है.
दिल्ली का इतिहास गवाह है कि जब तक यह टीम टूर्नामेंट के अहम मैचों में दबाव झेलना नहीं सीखेगी, तब तक शुरुआती जीतें सिर्फ एक धोखा ही साबित होंगी और ट्रॉफी का इंतजार लंबा खिंचता रहेगा. इस साल भी दिल्ली का प्रदर्शन कुछ ऐसा ही देखने को मिला है. शुरूआती मैच जीतने के बाद दिल्ली लगातार हार का सामना कर रही है. सात मैचों में दिल्ली की 3 जीत और चार हार है. इसके चलते वह अंक तालिका में 7वीं पोजीशन पर है.