नेपाल में बाढ़ क्यों आती रहती है? हिमालय, मानसून और नदियों की भौगोलिक बनावट का पूरा खेल

नेपाल में हर साल आने वाली बाढ़ के पीछे सिर्फ भारी बारिश जिम्मेदार नहीं है. हिमालय की भौगोलिक बनावट, तेज बहाव वाली नदियां, भूस्खलन, ग्लेशियल झीलें, नदी का कटाव और जलवायु परिवर्तन मिलकर बाढ़ का खतरा बढ़ाते हैं.

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Kanhaiya Kumar Jha

नेपाल को अक्सर दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ी देशों में गिना जाता है. हिमालय की ऊंची चोटियां, गहरी घाटियां और तेज बहाव वाली नदियां इसकी पहचान हैं. लेकिन यही भौगोलिक बनावट हर साल मानसून के दौरान नेपाल के लिए बड़ी चुनौती भी बन जाती है. बारिश शुरू होते ही देश के कई हिस्सों में बाढ़, अचानक आने वाली बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है.

नेपाल में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है. यहां बाढ़ और भूस्खलन लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं में शामिल रहे हैं. विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, नेपाल में 1980 से 2010 के बीच आपदाओं से होने वाली मानवीय क्षति में बाढ़ और भूस्खलन प्रमुख कारणों में रहे.

लेकिन सवाल यह है कि आखिर नेपाल में बाढ़ बार-बार क्यों आती है? क्या सिर्फ ज्यादा बारिश इसके लिए जिम्मेदार है? या फिर इसके पीछे हिमालय की भौगोलिक संरचना, नदियों का तेज बहाव, जंगलों की स्थिति, पहाड़ों पर निर्माण और बदलता मौसम भी बड़ी भूमिका निभाते हैं?


नेपाल की भौगोलिक स्थिति ही बनाती है बाढ़ का बड़ा आधार

नेपाल उत्तर में हिमालय और दक्षिण में भारत के गंगा के मैदानी क्षेत्र के बीच स्थित है. देश का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और ऊंचाई वाला है. उत्तर से दक्षिण की ओर आते हुए जमीन की ऊंचाई तेजी से कम होती जाती है.

नेपाल की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि हिमालय से निकलने वाली नदियां बहुत तेजी से नीचे की ओर बहती हैं. पहाड़ों में बारिश होने पर पानी कम समय में घाटियों और निचले इलाकों की ओर पहुंच सकता है. यही वजह है कि कई जगहों पर सामान्य बारिश भी अचानक तेज बहाव का रूप ले सकती है.

नेपाल की भौगोलिक बनावट को समझने के लिए एक तथ्य काफी महत्वपूर्ण है. पूर्वी नेपाल के एक उत्तर-दक्षिण हिस्से में लगभग 160 किलोमीटर की क्षैतिज दूरी में जमीन की ऊंचाई करीब नौ किलोमीटर तक बदलती है. इतनी तीखी ढलान पानी के बहाव को बेहद तेज बना देती है. यानी पहाड़ों में गिरा पानी लंबे समय तक वहां जमा रहने के बजाय तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है.

मानसून नेपाल की सबसे बड़ी वजहों में से एक

नेपाल में बाढ़ की चर्चा हो और मानसून का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है. दक्षिण एशिया में जून से सितंबर के बीच आने वाला मानसून हिमालय से टकराता है. बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाएं जब हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं तो बड़ी मात्रा में बारिश होती है. नेपाल की भौगोलिक स्थिति इसे भारी मानसूनी बारिश के लिए बेहद संवेदनशील बनाती है. समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है.

मसलन, 2021 में नेपाल के मध्य और पश्चिमी हिस्सों में एक सप्ताह के दौरान 300 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई थी. उस दौरान बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया.

इसलिए नेपाल में बाढ़ को केवल "नदी में पानी बढ़ना" समझना सही नहीं होगा. कई बार भारी बारिश, भूस्खलन, मलबे और अचानक पानी के बहाव की घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं.

पहाड़ों की ढलान और भूस्खलन बढ़ाते हैं बाढ़ का खतरा

नेपाल भूकंपीय और भूगर्भीय रूप से बेहद सक्रिय क्षेत्र में स्थित है. यहां की पहाड़ी ढलानें कई स्थानों पर अस्थिर हैं. मानसून के दौरान लगातार बारिश से मिट्टी में पानी की मात्रा बढ़ती है और पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है.

जब बड़े पैमाने पर मिट्टी, पत्थर और मलबा नदी में गिरता है तो नदी का रास्ता अस्थायी रूप से रुक सकता है. इससे ऊपर की ओर पानी जमा होने लगता है. अगर यह प्राकृतिक अवरोध अचानक टूट जाए तो नीचे की ओर बेहद तेज रफ्तार से पानी और मलबे का सैलाब आ सकता है. इसी तरह की घटनाओं को "डेब्रिस फ्लो" या मलबे के तेज बहाव के रूप में देखा जाता है.

इसका उदाहरण 2021 में मेलम्ची क्षेत्र में देखने को मिला था. भारी बारिश के बाद हिमनदीय मलबे के कटाव, एक मोरेन झील के ऊपर से पानी निकलने और अचानक जल-मलबा बहने जैसी घटनाओं ने मेलम्ची नदी क्षेत्र में भारी तबाही मचाई.

नेपाल की नदियां क्यों बन जाती हैं खतरनाक?

नेपाल में कई बड़ी नदियां हिमालय से निकलती हैं और दक्षिण की ओर भारत में प्रवेश करती हैं. इनमें कोशी, गंडक, बागमती, कमला, कर्णाली और महाकाली जैसी नदियां महत्वपूर्ण हैं. इन नदियों की एक खासियत है कि इनके ऊपरी हिस्से पहाड़ी और तेज ढलान वाले हैं, जबकि नीचे की ओर आते-आते ये अपेक्षाकृत समतल क्षेत्र में पहुंचती हैं.

ऊपरी इलाकों से तेज रफ्तार में आया पानी जब निचले और अपेक्षाकृत समतल इलाके में पहुंचता है तो बहाव की गति कम हो सकती है. इसके साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी और तलछट भी आती है. इससे नदी का तल ऊंचा हो सकता है और आसपास के क्षेत्रों में पानी फैलने का खतरा बढ़ जाता है.

नेपाल की पुरानी आपदा रिपोर्ट में भी कोशी, कमला, बागमती, नारायणी यानी गंडक, राप्ती और अन्य बड़ी नदियों के किनारे बाढ़ के जोखिम को प्रमुखता से दर्ज किया गया है.

चुरे क्षेत्र की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण

नेपाल के दक्षिणी हिस्से में हिमालय की मुख्य ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के आगे चुरे या शिवालिक क्षेत्र आता है. यह भूभाग कई जगहों पर अपेक्षाकृत कमजोर और कटाव के प्रति संवेदनशील है.

चुरे क्षेत्र से निकलने वाली कुछ नदियां बरसात के समय अचानक बहुत ज्यादा पानी और तलछट लेकर नीचे की ओर आती हैं. नेपाल की आपदा रिपोर्ट में भी चुरे से निकलने वाली मौसमी नदियों के अचानक बाढ़ लाने और भारी मात्रा में तलछट नीचे लाने का उल्लेख मिलता है. यही पानी जब तराई के अपेक्षाकृत समतल इलाकों में पहुंचता है तो बाढ़ का दायरा काफी बढ़ सकता है.

जंगलों की कटाई और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव

बाढ़ पूरी तरह इंसानी गतिविधियों का परिणाम नहीं है, लेकिन मानवीय गतिविधियां इसके असर को जरूर बढ़ा सकती हैं. पहाड़ी इलाकों में जंगलों की कटाई, सड़कों के लिए पहाड़ काटना, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव से मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है. बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहने लगता है और अपने साथ मिट्टी तथा पत्थर भी नीचे लाता है.

नेपाल में विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण और अन्य गतिविधियां बढ़ी हैं. ऐसे इलाकों में अगर ढलानों की स्थिरता, जल निकासी और भूगर्भीय स्थिति का पर्याप्त ध्यान न रखा जाए तो बारिश के समय भूस्खलन और मलबे का खतरा बढ़ सकता है.

ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलें भी चिंता की वजह

नेपाल का एक बड़ा हिस्सा हिमालय में आता है. ऊंचे पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर और उनसे जुड़ी झीलें भी बाढ़ के जोखिम से जुड़ी हैं. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के पीछे हटने की घटनाओं ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है. ग्लेशियरों के पिघलने से कुछ झीलों में पानी बढ़ सकता है. यदि किसी झील को रोकने वाला प्राकृतिक मोरेन बांध कमजोर होकर टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है. इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है.

विश्व बैंक ने भी चेतावनी दी है कि तापमान बढ़ने के साथ हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से नेपाल और दक्षिण एशिया के निचले मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है.

हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि नेपाल में हर बाढ़ ग्लेशियर पिघलने के कारण नहीं आती. अधिकांश मौसमी बाढ़ के पीछे भारी मानसूनी बारिश, नदी का बहाव, भूस्खलन और स्थानीय जल निकासी जैसी कई वजहें एक साथ काम करती हैं.

जलवायु परिवर्तन ने खतरा क्यों बढ़ाया है?

जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर यह है कि मौसम के पैटर्न में अनिश्चितता बढ़ रही है. बारिश कब शुरू होगी, कितनी होगी और कितने कम समय में कितनी बारिश होगी, इन सवालों का जवाब पहले की तुलना में अधिक जटिल होता जा रहा है. नेपाल में पहले से ही मानसूनी बारिश बहुत महत्वपूर्ण है. ऐसे में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बाढ़ और भूस्खलन दोनों के जोखिम को बढ़ा सकती हैं.

विश्व बैंक ने नेपाल के लिए भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन को बदलते जलवायु जोखिमों के साथ जोड़ते हुए बेहतर आपदा तैयारी और जलवायु लचीलापन बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है.

यहां एक बात समझना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि नेपाल में हर साल पहले से ज्यादा बारिश ही होगी. असली चिंता बारिश के स्वरूप और चरम घटनाओं की बढ़ती अनिश्चितता है.

नेपाल की बाढ़ का असर भारत तक क्यों पहुंचता है?

नेपाल की बाढ़ सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं रहती. इसका असर भारत के कई सीमावर्ती और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है. इसकी वजह है नेपाल की नदियों का दक्षिण की ओर भारत में आना. कोशी, गंडक, बागमती, कमला और कई अन्य नदियां नेपाल से निकलकर भारत में प्रवेश करती हैं और आगे गंगा नदी तंत्र का हिस्सा बनती हैं.

इसलिए नेपाल के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश होने पर वहां से आने वाला अतिरिक्त पानी भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य निचले इलाकों में भी बाढ़ की स्थिति को प्रभावित कर सकता है. यही कारण है कि नेपाल में आने वाली बड़ी बाढ़ को भारत के लिए भी महत्वपूर्ण जल और आपदा प्रबंधन मुद्दे के रूप में देखा जाता है.

क्या नेपाल में बाढ़ को पूरी तरह रोका जा सकता है?

बाढ़ को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा प्राकृतिक भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों से जुड़ा है. लेकिन इसके कारण होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

इसके लिए कुछ कदम बेहद महत्वपूर्ण हैं:-

  • पहला, समय रहते चेतावनी. नदी के जलस्तर, बारिश और पहाड़ी झीलों की लगातार निगरानी जरूरी है.
  • दूसरा, बेहतर जल निकासी. शहरों और गांवों में प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध नहीं किया जाना चाहिए.
  • तीसरा, जोखिम वाले इलाकों में निर्माण पर नियंत्रण. नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र और अस्थिर पहाड़ी ढलानों पर अनियोजित निर्माण भविष्य के नुकसान को बढ़ा सकता है.
  • चौथा, पहाड़ी ढलानों की सुरक्षा. सड़क निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं में भूगर्भीय स्थिति, जल निकासी और ढलान स्थिरता को प्राथमिकता देनी होगी.
  • पांचवां, भारत-नेपाल सहयोग. सीमा पार बहने वाली नदियों के मामले में बारिश, जलस्तर और संभावित बाढ़ की जानकारी समय पर साझा करना दोनों देशों के लिए बेहद जरूरी है.

नेपाल में बार-बार आने वाली बाढ़ के पीछे कोई एक कारण नहीं है. यह हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं, तीखी ढलानों, भारी मानसूनी बारिश, तेज बहाव वाली नदियों, भूस्खलन, चुरे क्षेत्र के कटाव, नदी में जमा होने वाली तलछट, ग्लेशियल झीलों और बदलते जलवायु पैटर्न का मिला-जुला परिणाम है.

इसे एक आसान उदाहरण से समझें तो नेपाल एक ऐसी प्राकृतिक व्यवस्था में स्थित है जहां ऊपर पहाड़ हैं, बीच में तेज ढलानें हैं और नीचे विशाल मैदानी क्षेत्र. जब मानसून में पहाड़ों पर बहुत ज्यादा पानी गिरता है तो वह तेजी से नदियों के जरिए नीचे की ओर आता है. अगर रास्ते में भूस्खलन, मलबा या नदी की क्षमता से अधिक पानी जुड़ जाए तो बाढ़ की स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है. और क्योंकि नेपाल की कई प्रमुख नदियां भारत की ओर बहती हैं, इसलिए नेपाल की बाढ़ का असर सीमा पार भी दिखाई दे सकता है.

यही वजह है कि नेपाल में बाढ़ को केवल एक मौसमी आपदा मानकर नहीं देखा जा सकता. यह हिमालय, मानसून, जलवायु परिवर्तन और पूरे गंगा नदी तंत्र से जुड़ा एक क्षेत्रीय मुद्दा है. आने वाले वर्षों में बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक भूमि उपयोग, सुरक्षित निर्माण और नेपाल-भारत के बीच मजबूत जल एवं आपदा प्रबंधन सहयोग ही इसके नुकसान को कम करने की सबसे अहम कुंजी हो सकते हैं.