'तेहरान के वरिष्ठ नेताओं को निशाना बना सकता है इजरायल', अमेरिका ने ईरान के पड़ोसी देशों को दिया था संदेश
अमेरिका ने मध्य-पूर्व के कई देशों से ईरान को आगाह करने का अनुरोध किया कि इजरायल उसके वरिष्ठ नेताओं को निशाना बना सकता है. रिपोर्टों के अनुसार, वाशिंगटन को आशंका थी कि ऐसा कोई कदम युद्धविराम वार्ता और संभावित शांति समझौते को गंभीर झटका दे सकता है.
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता पर बातचीत जारी है. हालांकि अब सामने आ रहे मीडिया रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. रिपोर्टों के अनुसार, वाशिंगटन को आशंका थी कि युद्धविराम वार्ता के बीच इजरायल की ओर से ईरान के वरिष्ठ नेता को निशाना बनाया जा सकता है. ऐसा न हो इसके लिए अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के कई देशों से ईरान को आगाह करने का अनुरोध किया.
अमेरिका को डर था कि अगर ऐसा होता है तो शांति वार्ता बीच में खत्म हो सकती है और तनाव ज्यादा हो सकता है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वाशिंगटन ने अपने सहयोगी देशों से कहा कि वे ईरान को इस संभावना के प्रति सतर्क करें कि इजरायल उसके कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है.
अमेरिका और इजरायल की रणनीति में दिखा अंतर
अमेरिकी प्रशासन को आशंका थी कि यदि ऐसा हुआ तो अप्रैल में शुरू हुई युद्धविराम वार्ता पूरी तरह पटरी से उतर सकती है और क्षेत्र में एक बार फिर व्यापक सैन्य संघर्ष भड़क सकता है. बताया गया है कि संभावित निशानों में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची और संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ प्रमुख थे.
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दोनों नेता उस समय क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी कूटनीतिक प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. रिपोर्टों के अनुसार, संघर्ष के शुरुआती चरण में अमेरिका और इजरायल के उद्देश्य काफी हद तक समान दिखाई दे रहे थे. हालांकि जैसे-जैसे युद्धविराम और शांति वार्ता आगे बढ़ी, दोनों देशों की प्राथमिकताओं में अंतर स्पष्ट होने लगा.
अमेरिका का मानना था कि वार्ता के दौरान ईरान के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व पर किसी भी प्रकार का हमला न केवल बातचीत को समाप्त कर देगा, बल्कि पूरे क्षेत्र को दोबारा हिंसा की ओर धकेल सकता है. इसी कारण वाशिंगटन ने कूटनीतिक माध्यमों से ईरान तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि उसके वरिष्ठ अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर खतरा बना हुआ है.
युद्ध की शुरुआत से निशाने पर रहा नेतृत्व
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संघर्ष के शुरुआती दौर में इजरायल ने ईरान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को अपनी रणनीति का मुख्य लक्ष्य बनाया था. इसी दौरान ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई, जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष नेता और पूर्व विदेश मंत्री भी शामिल बताए गए.
विश्लेषकों का मानना है कि इन नेताओं को अपेक्षाकृत व्यवहारिक दृष्टिकोण रखने वाला माना जाता था और भविष्य की वार्ताओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती थी. अमेरिकी प्रशासन युद्धविराम को स्थायी शांति समझौते में बदलने के प्रयासों में जुटा था, जबकि रिपोर्टों के अनुसार इजरायल इस प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था. इजरायल का मानना था कि शुरुआती समझौते से उसके घोषित रणनीतिक लक्ष्य पूरी तरह पूरे नहीं होंगे.