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यूक्रेन से लड़ने के लिए रूस को 126 देशों से लेनी पड़ रही मदद? विदेशी युवाओं को नौकरी के बहाने बुलाकर जंग में धकेला!

रूस और यूक्रेने के बीच लंबे समय से युद्ध जारी है. इस युद्ध में दोनों देशों को भारी नुकसान हुआ है. हालांकि अब सामने आ रही जानकारी के मुताबिक रूस ने इस जंग को अकेले नहीं बल्कि 126 देशों की मदद से लड़ा है. आइए इन दावों को गहराई से समझते हैं.

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Edited By: Shanu Sharma
यूक्रेन से लड़ने के लिए रूस को 126 देशों से लेनी पड़ रही मदद? विदेशी युवाओं को नौकरी के बहाने बुलाकर जंग में धकेला!
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक नया रिपोर्ट सामने आया है. हालांकि इस नए दावे ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सनसनी मचा दी है. रिपोर्ट्स की मानें तो रूस अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए अपने देश पर नहीं बल्कि अन्य  126 देशों पर निर्भर हैं. 

रिपोर्ट के मुताबिक रूस से हजारों युवाओं को अपने देश में लाकर यूक्रेन के खिलाफ जंग में उतार रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि इन युवाओं को बेहतर जिंदगी का सपना दिखाकर रूस लाया जाता है और फिर उनके हाथों में हथियार पकड़ा कर सीधे युद्ध के मैदान में धकेल दिया जाता है. 

इन देशों के युवाओं को लाया जा रहा रूस

इस रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों से युवा काम की तलाश में रूस पहुंचे. इन युवाओं से गार्ड, कुक, क्लीनर या टेक्नीशियन की नौकरी का वादा करके लाया गया था. इसके लिए उन्होंने आकर्षक वेतन और बेहतर सुविधाओं का भी लालच दिया. एजेंटों के माध्यम से ये युवा रूस पहुंचे थे, कई लोगों ने रोजगार की आशा में कर्ज तक ले लिया लेकिन जब रूस पहुंचे तो स्थिति और भी ज्यादा बदतर हो गई. उस रिपोर्ट में कहा गया कि इन युवाओं से ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए, जिनकी भाषा वे समझ ही नहीं सके. कुछ ही दिनों के भीतर उन्हें सैन्य वर्दी पहनाई गई और यूक्रेन युद्ध के सबसे खतरनाक इलाकों में भेज दिया गया.

विदेशी युवाओं की जिंदगी से खेल

रिपोर्ट्स के अनुसार, यूक्रेन के फ्रंटलाइन क्षेत्रों में नए रंगरूटों की औसत जिंदगी महज 72 घंटे की बताई जा रही है. रिपोर्ट में कहा गया कि जंग में उतारने से पहले इन विदेशी युवाओं को कोई खास ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती है. वहीं रूस अपने देश के अनुभवी सैनिक को अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थानों पर रखता है. दूसरे देशों से आए युवा ड्रोन हमले, भारी बमबारी और बारूदी सुरंगों के बीच होते हैं, जहां सबसे ज्यादा जोखिम होता है. वहीं अगर कोई युवा ऐसा करने से मना कर दे तो उन्हें धमकाया भी जाता है.  

कैमरून जैसे देशों में बेरोजगारी और गरीबी इस पूरे खेल की सबसे बड़ा शिकार है. वहां की आबादी का आधा हिस्सा 20 साल से कम उम्र का है और शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 35 फीसदी तक पहुंच चुकी है. कुछ रिपोर्ट में पता चला कि आधे से ज्यादा जनता देश छोड़ना चाहते हैं. ऐसे में रूस इसका पूरा फायाद उठा रहा है. कहा जा रहा है कि इस पूरे खेल में एक संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क काम कर रहा है. जो स्थानीय एजेंटों की मदद से दूसरे देशों के युवाओं को रूस लाता है और उनकी जीवन को इस अंधकार की ओर फेंक देता है.