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खामेनेई की मौत के बाद क्या ईरान पर फिर से कायम होगी राजशाही? रजा पहलवी और तीन राजकुमारियों पर टिकी नजर

ईरान के सुप्रीम लीडर के निधन के बाद सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज हो गई हैं. ऐसे में निर्वासित प्रिंस रजा पहलवी और उनके परिवार की संभावित वापसी पर चर्चा शुरू हो गई है. जानिए शाही परिवार का इतिहास, उनका स्टैंड और आगे की संभावनाएं.

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Edited By: Babli Rautela
खामेनेई की मौत के बाद क्या ईरान पर फिर से कायम होगी राजशाही? रजा पहलवी और तीन राजकुमारियों पर टिकी नजर
Courtesy: Instagram

ईरान की सियासत में बड़ा बदलाव आने के बाद एक पुराना सवाल फिर सामने आ गया है. क्या अब पहलवी राजवंश की वापसी संभव है. सुप्रीम लीडर के निधन के बाद देश में सत्ता संतुलन को लेकर चर्चाएं तेज हैं. ऐसे में निर्वासित प्रिंस रेजा पहलवी का नाम फिर सुर्खियों में है.

1979 की ईरानी क्रांति में राजशाही का अंत हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई. उस समय अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटना पड़ा और उन्हें देश छोड़ना पड़ा. तब से पहलवी परिवार विदेश में रह रहा है.

अमेरिका में बसा शाही परिवार

रजा पहलवी अपने परिवार के साथ अमेरिका में रहते हैं. वह कई बार खुले मंच से ईरान में लोकतांत्रिक बदलाव की वकालत कर चुके हैं. उनका कहना रहा है कि यदि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यवस्था बने तो वह लौटने को तैयार हैं. उनकी पत्नी यास्मीन और तीन बेटियां नूर, इमान और फराह भी सार्वजनिक मंचों पर ईरान के लोगों के अधिकारों की बात करती रही हैं.

सबसे बड़ी बेटी Noor Pahlavi का जन्म अमेरिका में हुआ. उन्होंने कई बार कहा कि ईरान के अंदर और बाहर से बढ़ता दबाव बताता है कि बदलाव की संभावना पहले से ज्यादा मजबूत है. उनका मानना है कि शासन पहले से ज्यादा कमजोर दिखाई दे रहा है. नूर ने अपनी पढ़ाई अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थानों से की है और वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहती हैं. कुछ ईरानी अब भी उन्हें शाही परिवार की प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं.

इमान और फराह की भूमिका

दूसरी बेटी इमान पहलवी ने 2023 में ब्रैडली शेरमैन से विवाह किया. इस विवाह को लेकर भी चर्चा हुई कि यदि राजशाही कायम रहती तो यह एक शाही समारोह होता. सबसे छोटी बेटी फराह पहलवी भी अमेरिका में पली बढ़ीं और उन्होंने भी अपने पिता के विचारों का समर्थन किया है.

रजा पहलवी ने कई बार कहा है कि उनका लक्ष्य सत्ता हथियाना नहीं बल्कि जनता को विकल्प देना है. वह लोकतांत्रिक जनमत संग्रह की बात करते हैं ताकि ईरान की जनता खुद तय करे कि वह किस तरह की व्यवस्था चाहती है. इतिहास में 1953 की घटना भी याद की जाती है जब विदेशी हस्तक्षेप के बाद सत्ता संतुलन बदला था. ऐसे में कुछ विश्लेषक मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय भूमिका फिर अहम हो सकती है.