बांग्लादेश में गहराता राजनीतिक संकट, मोहम्मद यूनुस ने दी इस्तीफे की धमकी, शेख हसीना की होगी वापसी?
पिछले साल अगस्त 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था. यह आंदोलन सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रणाली के खिलाफ शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह हिंसक प्रदर्शनों में तब्दील हो गया.
बांग्लादेश में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता की लहरें उठ रही हैं. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने इस्तीफे की धमकी देकर देश की सियासत में नया तूफान खड़ा कर दिया है. उन्होंने कहा है कि यदि राजनीतिक दलों के बीच चुनावी सुधारों पर सहमति नहीं बनी, तो वह अपना पद छोड़ देंगे. यह बयान ऐसे समय में आया है, जब बांग्लादेश पहले ही आर्थिक असमानता, सामाजिक उथल-पुथल और राजनीतिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है. दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की वापसी की अटकलों ने भी इस संकट को और जटिल बना दिया है.
पिछले साल अगस्त 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था. यह आंदोलन सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रणाली के खिलाफ शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह हिंसक प्रदर्शनों में तब्दील हो गया. इस दौरान 32 से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए. बढ़ते दबाव के बीच शेख हसीना को इस्तीफा देकर भारत में शरण लेनी पड़ी. इसके बाद बांग्लादेश की सेना ने हस्तक्षेप करते हुए एक अंतरिम सरकार का गठन किया, जिसके प्रमुख सलाहकार के रूप में 84 वर्षीय अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस को नियुक्त किया गया.
यूनुस, जिन्हें माइक्रोक्रेडिट के लिए 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, ने देश में स्थिरता लाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करने का वादा किया था. उनकी नियुक्ति को छात्र आंदोलनकारियों ने समर्थन दिया था, जिन्होंने उन्हें एक तटस्थ और सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में देखा. हालांकि, नौ महीने बाद भी यूनुस की सरकार कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है.
इस्तीफे की धमकी
मोहम्मद यूनुस ने 22 मई 2025 को अपनी सलाहकार परिषद की बैठक में इस्तीफे की पेशकश की, जिसने देश में हलचल मचा दी. उन्होंने कहा कि वह स्वतंत्र रूप से काम करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं और यदि राजनीतिक दल और सेना उनकी नीतियों का समर्थन नहीं करेंगे, तो वह अपने पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं देखते.
यूनुस की इस नाराजगी के पीछे कई कारण
चुनावी सुधारों पर असहमति
यूनुस ने 2026 तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का वादा किया था, लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) जैसे विपक्षी दल तत्काल चुनाव की मांग कर रहे हैं. बीएनपी ने यूनुस पर वादा पूरा न करने और उनकी सरकार पर सत्ता को लंबे समय तक अपने पास रखने की कोशिश करने का आरोप लगाया है.
सेना के साथ तनाव
बांग्लादेश की सेना के प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने यूनुस को दिसंबर 2025 तक चुनाव कराने का सख्त निर्देश दिया है. इसके अलावा, म्यांमार के साथ मानवीय गलियारे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति जैसे मुद्दों पर भी दोनों के बीच मतभेद सामने आए हैं. यूनुस द्वारा पूर्व राजनयिक खलीलुर रहमान को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त करने का फैसला सेना को स्वीकार्य नहीं है.
आलोचनाएं और कट्टरपंथी दबाव
यूनुस पर कट्टरपंथी संगठनों जैसे जमात-ए-इस्लामी और हिफाजत-ए-इस्लाम का समर्थन लेने के आरोप लग रहे हैं. इन संगठनों की ओर से उनकी सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, जिसके चलते यूनुस ने खुद को "बंधक जैसा" महसूस करने की बात कही है.
शेख हसीना की वापसी की अटकलें
यूनुस के इस्तीफे की धमकी के साथ ही शेख हसीना की वापसी की अटकलें तेज हो गई हैं. हसीना जो वर्तमान में भारत में हैं ने हाल ही में बयान जारी कर अपनी पार्टी अवामी लीग को संगठित करने और बांग्लादेश में सक्रिय राजनीति में लौटने की इच्छा जताई है. उनकी पार्टी ने 1 फरवरी 2025 से देशव्यापी प्रदर्शनों की घोषणा की थी जिसमें यूनुस सरकार के इस्तीफे की मांग की गई थी. हालांकि, यूनुस सरकार ने हसीना की अवामी लीग पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया है, जिसे कई विश्लेषकों ने राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देखा है.