पाकिस्तान ने फिर कराई अपनी इंटरनेशनल बेइज्जती, US-ईरान शांति वार्ता के लिए बुक होटल का बिल नहीं भर पाई शाहबाज सरकार
इस्लामाबाद में आयोजित अमेरिका-ईरान शांति वार्ता पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक फजीहत साबित हुई है. फाइव स्टार सेरेना होटल का बिल चुकाने में सरकार की नाकामी ने उसकी वैश्विक साख और प्रशासनिक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
नई दिल्ली: पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत दिखाने का एक सुनहरा मौका अब वैश्विक शर्मिंदगी का सबब बन गया है. इस्लामाबाद में हाल ही में संपन्न हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता न केवल बेनतीजा रही, बल्कि पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी भारी किरकिरी करा दी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान सरकार वार्ता की मेजबानी के लिए चुने गए प्रतिष्ठित फाइव स्टार 'सेरेना होटल' का बिल चुकाने में पूरी तरह नाकाम रही है.
सूत्रों के हवाले से आ रही खबरें इस कदर चौंकाने वाली हैं कि स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है. जानकारी के अनुसार, जब सरकार की ओर से बिल का भुगतान नहीं हुआ, तो अंततः होटल के मालिक को स्वयं आगे आकर इस पूरे आयोजन का खर्च उठाना पड़ा. बता दें कि इस होटल का स्वामित्व 'आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क' के पास है. जिस कार्यक्रम को पाकिस्तान अपनी विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रहा था, वह अब एक 'पब्लिक रिलेशंस डिजास्टर' में तब्दील हो चुका है.
बड़े दावों और जमीनी हकीकत का अंतर
पाकिस्तान ने इस शिखर सम्मेलन के जरिए दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वह अमेरिका और ईरान के बीच एक भरोसेमंद और सक्षम मध्यस्थ बन सकता है. लेकिन एक होटल का बिल न भर पाना यह साफ करता है कि पाकिस्तान के बड़े-बड़े कूटनीतिक दावों और उसकी कड़वी जमीनी आर्थिक हकीकत के बीच कितनी गहरी खाई है. अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह बुनियादी विफलता दिखाती है कि पाकिस्तानी प्रशासन अब रोजमर्रा के खर्च उठाने में भी लाचार है.
आर्थिक बदहाली और बेनतीजा रही 21 घंटे की वार्ता
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त निगरानी में है और देश में महंगाई दर 7 से 9 प्रतिशत के बीच बनी हुई है. आर्थिक तंगी के बीच कूटनीतिक विफलता ने देश की साख को गहरा धक्का पहुंचाया है. अमेरिका और ईरान के बीच सेरेना होटल में 21 घंटे से अधिक समय तक चली मैराथन वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. परमाणु कार्यक्रम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मुद्दों पर आपसी अविश्वास के कारण यह वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हुई, जिससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय मध्यस्थ की भूमिका भी कमजोर पड़ गई है.