नेपाल सरकार के एक फैसले से सुलगा काठमांडू, जिस Gen-Z ने बालेन शाह को बनाया हीरो, वही अब क्यों उतरा सड़कों पर?
काठमांडू में झुग्गियां हटाने की कार्रवाई के खिलाफ विरोध तेज हो गया है. पुनर्वास की मांग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन अब सरकार विरोधी आंदोलन बन चुका है, जिससे प्रधानमंत्री बालेन शाह पर राजनीतिक दबाव बढ़ता दिख रहा है.
नई दिल्ली: नेपाल की राजधानी काठमांडू इन दिनों बढ़ते विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बनी हुई है. झुग्गी बस्तियों को हटाने की सरकारी कार्रवाई के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब सरकार विरोधी अभियान का रूप ले चुका है. बड़ी संख्या में युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग सड़कों पर उतरकर पुनर्वास की मांग कर रहे हैं. इस विरोध ने प्रधानमंत्री बालेन शाह के सामने अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है.
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार गरीब, भूमिहीन और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले परिवारों को बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना के उनके घरों से बेदखल कर रही है. उनका कहना है कि जिन लोगों को अस्थायी होल्डिंग सेंटरों में भेजा गया, वहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है. इसी वजह से लोगों का असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है.
बाढ़ और लाठीचार्ज से भड़का गुस्सा
हालात तब और बिगड़ गए जब एक अस्थायी सेंटर में बाढ़ आने से करीब 150 लोग फंस गए. अगले दिन वहां की स्थिति देखने पहुंचे युवा कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. इस दौरान एक प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गया. इस घटना के बाद राजधानी में विरोध प्रदर्शन और तेज हो गया तथा सरकार के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आने लगी.
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आत्मदाह और गिरफ्तारियों ने बढ़ाया तनाव
इसी महीने 25 वर्षीय प्रदर्शनकारी गणेश नेपाली के आत्मदाह की घटना ने भी माहौल को और संवेदनशील बना दिया. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस कार्रवाई से परेशान होकर उसने यह कदम उठाया. दूसरी ओर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और पत्रकारों की गिरफ्तारी ने भी विवाद को गहरा कर दिया. विपक्षी नेताओं ने इन गिरफ्तारियों की आलोचना करते हुए सरकार से संयम बरतने की अपील की है.
आंकड़े बता रहे हैं बढ़ती परेशानी
सरकारी अभियान के तहत अप्रैल 2026 से अब तक 2600 से अधिक परिवारों को उनके घरों से हटाया जा चुका है. इससे करीब 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं. इनमें से कई परिवार अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं. सरकार ने 6 जुलाई तक इन शिविरों को खाली करने का निर्देश दिया था, लेकिन दर्जनों परिवारों ने वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने का हवाला देते हुए वहां से जाने से इनकार कर दिया.
बालेन शाह के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह आंदोलन बालेन शाह की लोकप्रियता की बड़ी परीक्षा बन गया है. जिन युवाओं ने पहले उनके विकास एजेंडे का समर्थन किया था, वही अब उनकी नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. आने वाले दिनों में सरकार इस विरोध का समाधान कैसे निकालती है, इस पर पूरे नेपाल की नजर बनी हुई है.