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मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों को ईरान ने बनाया निशााना, खाक हो गए 13 सैन्य स्टेशन

मिडिल ईस्ट जंग थमने का नाम नहीं ले रहा. इस युद्ध में ईरान काफी आक्रामक नजर आ रहा है. मिल रही जानकारी के मुताबिक ईरान ने अब तक मीडिल ईस्ट में स्थिति 13 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है.

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Shanu Sharma

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में मौजूद 13 अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ईरान ने कहर बरपाया है, यह ठिकाने अब रहने योग्य नहीं रह गए हैं.

अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. जिसके बाद से ईरान ने बदले की कसम खाई है. ईरान द्वारा लगातार खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया जा रहा है. 

रिपोर्ट में क्या कहा गया?

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वाशिंगटन और तेल अवीव ने ईरान की प्रतिक्रिया की तीव्रता और पैमाने को पूरी तरह कम आंक लिया था. ईरानी बलों ने अमेरिकी सैन्य और ऊर्जा संपत्तियों को निशाना बनाते हुए उच्च सटीकता वाली मिसाइलों और ड्रोन हमलों से अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. ये हमले न केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित रहे, बल्कि रणनीतिक महत्व के स्थानों, राजनयिक मिशनों और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित किया.

इस युद्ध के कारण अमेरिकी सैनिकों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त ठिकानों से निकालकर होटलों, अस्थायी कार्यालयों और अन्य कामचलाऊ आश्रयों में शरण लेनी पड़ी है. हालांकि खतरे देखते हुए अमेरिका ने जमीन पर तैनात सुरक्षा कर्मियों को असुरक्षित ठिकानों से हटा लिया है, वहीं हवाई हमले उन सीमित ठिकानों से किया जा रहा है जो अभी भी सुरक्षित है.

कुवैत में अमेरिकी ठिकानों पर हमला

ईरान हमलों का सबसे ज्यादा प्रभाव कुवैत पर पड़ा है. यहां पोर्ट शुएबा, अली अल सलेम एयर बेस और कैंप ब्यूहरिंग जैसे महत्वपूर्ण ठिकाने ईरानी हमले के निशाना बन गए. ईरानी सेना ने अपनी सीमा के सबसे करीब होने का फायदा उठाते हुए खासतौर पर निशाना बनाया.

इन ठिकानों पर हुए हमलों ने न केवल सैन्य सुविधाओं को नष्ट किया, बल्कि पूरे क्षेत्र में ईरानी ताकत के प्रति एक नया संदेश भी दिया. कुवैत के ये तीनों ठिकाने अब इतने क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि उनमें सामान्य सैन्य गतिविधियां  भी नहीं की जा सकती है. ईरान के हमलों का दायरा सिर्फ कुवैत तक सीमित नहीं रहा बल्कि कतर, बहरीन और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी-संबंधित ठिकानों में भी देखने को मिला है. जिससे तबाही का पैमाना और बढ़ गया.