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विरोध की भेंट चढ़ गया ईरान का संसदीय चुनाव! निराश जनता नहीं करने आई वोट

Iran Election: शुक्रवार को ईरान में हुए संसदीय चुनावों को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार तेहरान में बेहद कम मतदान हुआ है.

Bloomberg
India Daily Live

Iran Election: शक्रवार को ईरानी सरकार की वैद्यता के लिए हुए संसदीय चुनावों में जनता ने उत्साह नहीं दिखाया. ईरानी मीडिया की अनौपचारिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में मात्र 40 फीसदी जनता ने ही चुनाव प्रक्रिया में दिलचस्पी दिखाई और मतदान में भाग लिया. ईरान के नरमपंथी और रूढ़िवादी नेताओं ने पूरे चुनाव से दूरी बनाए रखी. वहीं, ईरानी समाज के सुधारवादी नेताओं ने चुनावों को महज  दिखावा बताया.

सुधारवादी नेताओं ने आरोप लगाया कि यह चुनाव मुख्य रूप से इस्लामिक मान्यताओं को मानने वाले कट्टर और रूढ़िवादी लोगों के बीच का मुकाबला था जो न स्वतंत्र था और न ही ईमानदार. ईरान के पहले सुधारवादी राष्ट्रपति नेता मोहम्मद खतामी ने शुक्रवार को हुए चुनावों से पूरी तरह दूरी बनाए रखी और आलोचना की. 

चुनाव महज दिखावा 

नोबेल पीस प्राइज विनर और मानवाधिकार कार्यकर्ता नरगेस मोहम्मदी ने चुनाव प्रक्रिया को महज दिखावा करार दिया. ईरान के हमशहरी और कायहान दोनों अखबारों ने बताया कि पहले किए सर्वे के आधार पर 41 फीसदी वोटिंग का अनुमान लगाया था.  हमशहरी अखबार ने अपने पहले पन्ने की हेडलाइन में अमेरिकी राष्ट्रपति को मतपत्र पर थप्पड़ मारते हुए दिखाया है. अखबार ने बताया कि मुल्क की 25 मिलियन जनता ने चुनावों का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया. 

ईरान का आंतरिक मंत्रालय शनिवार को संसदीय चुनाव के नतीजों की घोषणा कर सकता है. मीडिया द्वारा बताए जा रहे आंकड़ों की यदि पुष्टि हो जाती है तो यह 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद तेहरान में सबसे कम मतदान होगा. बीते कुछ चुनावों में ईरान में लगातार मतदाताओं ने चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने से दूरी बनाई है जिसकी बड़ी वजह सरकार का पारंपरिक और कट्टर इस्लामिक रवैया है. 2016 में संसदीय चुनाव में ईरानी जनता ने 62 फीसदी मतदान किया था. यह आंकड़ा साल 2020 में सिमटकर 42.5 फीसदी पर आ गया था. 

हिजाब विरोधी आंदोलन

ईरान की 290 सदस्यीय संसद की सदस्यता के लिए 15000 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे थे.  ईरानी संसद को इस्लामिक कंसल्टेटिव असेंबली के रूप में भी जाना जाता है. इस्लामिक क्रांति के बाद तेहरान ने पिछले साल हिजाब आंदोलन के रूप में सबसे बड़े विद्रोह का सामना किया था. इस आंदोलन ने ईरानी अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान पहुंचाया था.