चुनावी माहौल में बांग्लादेशी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बदले सुर, करने लगा भारत के साथ दोस्ती का दावा

बांग्लादेश में आम चुनाव में महज कुछ दिनों का समय बचा है. इससे पहले जमात-ए-इस्लामी ने अपनी घोषणापत्रा जारी कर दी है. जिसमें भारत का भी जिक्र किया गया है.

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Shanu Sharma

नई दिल्ली: बांग्लादेश में आम चुनाव होने में कुछ दिनों का समय बचा है. इसी बीच इस्लामिक कंजर्वेटिव पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने अपनी चुनावी घोषणापत्र जारी कर दी है. भारत के लिहाजा से यह घोषणापत्र जरूरी है, क्योंकि इस घोषणा पत्र में हमारे देश का भी जिक्र किया गया है.

जमात-ए-इस्लामी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में लिखा कि वह सत्ता में आने के बाद भारत सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्तों को सुधारेगा. पड़ोसी मुल्क में शेख हसीना सरकार की सत्ता गिरने के बाद से लगातार तनाव बढ़ा हुआ है. 

घोषणापत्र में बड़ा दावा

बांग्लादेश के चुनाव में अब महज कुछ दिनों का समय बचा है. ऐसे में पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में पड़ोसी मुल्कों के साथ अपने रिश्ते का जिक्र कर लोगों का ध्यान अपनी ओर खिंचा है. उन्होंने लिखा कि भारत, भूटान, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों के साथ एक बार फिर से सहयोगी संबंध स्थापित किए जाएंगे. इस समझौते में शांति और स्थितरता को प्राथमिकता दी जाएगी. इतना ही नहीं पार्टी ने अपने घोषणापत्र में वैश्विक स्तर पर बांग्लादेश की छवी और यहां के पासपोर्ट की  विश्वसनीयता को बढ़ाने पर जोर दिया. वहीं घोषणापत्र में मुस्लिम देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की नीति का भी जिक्र किया गया है. 

बांग्लादेश हिंसा के बाद पहला चुनाव

पड़ोसी मुल्क में 12 फरवरी को चुनाव होने हैं. ऐसे में सभी पार्टियां अपनी आखिरी ताकत लगानी शुरू कर दी है. वहीं शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को इस चुनाव में भाग लेने से बैन कर दिया गया है. जिसके बाद यह चुनाव और भी ज्यादा दिलचस्प हो गया क्योंकि ये चुनाव बांग्लादेश के लिए एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.

वहीं भारत के लिए भी पड़ोसी मुल्क का यह चुनाव जरूरी है, दोनों देश एक लंबी सीमा को साझा करते हैं. ऐसे में कोई भी तनाव भारत के लिए भी चिंता की वजह बन सकती है. जब शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह की आग फैली तब उन्हें अपने देश को छोड़क कर भारत आना पड़ा. तब से शेख हसीना भारत में ही रह रहीं है. हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश के भारत के साथ अच्छे रिश्ते थे. लेकिन उनके बाद वहां के अल्पसंख्यकों की समस्या बढ़ती ही जा रही है.