क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? इसे समझौते में शामिल क्यों करना चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिका और ईरान के बीच अभी शांति समझौते पर चर्चा की जा रही है. हालांकि इस समझौते के बीच अचानक अब्राहम अकॉर्ड्स को लेकर चर्चा बढ़ गई है. तो चलिए जानते हैं क्या है ये और ट्रंप इसपर क्यों जोर दे रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते के बीच मुस्लिम देशों के सामने साफ शर्त रख दी है. ट्रंप की ओर से कहा गया कि उन्हें इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने होंगे और इसके लिए अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करने होंगे.
राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि इससे मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित होगी और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ेगा. हालांकि कई प्रमुख मुस्लिम देशों की ओर से अभी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है. इसे पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका के रुप में देखा जा रहा है.
अब्राहम अकॉर्ड्स क्या है?
अब्राहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू किया गया ऐतिहासिक समझौता है. इसका मुख्य उद्देश्य इजरायल और अरब-मुस्लिम देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी को समाप्त कर सामान्य राजनयिक, व्यापारिक और सुरक्षा संबंध स्थापित करना है. इसके तहत देश एक-दूसरे में दूतावास खोलते हैं, व्यापार बढ़ाते हैं, निवेश करते हैं और सुरक्षा व प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सहयोग करते हैं. पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इजरायल के साथ संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ. बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हो गए. वर्ष 2025 में कजाखस्तान ने भी इस समूह में शामिल होने की घोषणा की.
ट्रंप के प्रस्ताव पर पाकिस्तान का रिएक्शन
इस समझौते का नाम पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों धर्मों में समान सम्मान प्राप्त है. इसे तीनों अब्राहमिक धर्मों के बीच साझा सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का प्रतीक बताया गया. यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि इससे पहले अरब देशों का रुख था कि फिलिस्तीन समस्या हल हुए बिना इजरायल को मान्यता नहीं दी जाएगी.
ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ चल रही बातचीत सफल होने पर कई और देश इस समझौते में शामिल हो सकते हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि भविष्य में ईरान भी इसमें शामिल हो सकता है. ट्रंप के प्रस्ताव पर सबसे तेज और साफ विरोध पाकिस्तान की ओर से आया है. पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ऐसा कोई समझौता नहीं करेगा जो उसकी मूल विचारधारा के विरुद्ध हो. पाकिस्तान का रुख है कि जब तक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं होती, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो, तब तक इजरायल को मान्यता नहीं दी जाएगी.