बलूचिस्तान में मिला ऐसा खजाना, बदल देगा पाकिस्तान की किस्मत? अमेरिका से लेकर चीन तक सब पड़े पीछे, जानें भारत के लिए कैसे एक मौका
यह सब कुछ भारत के लिए भी एक रणनीतिक अवसर बन सकता है. बलूचिस्तान में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ लंबे समय से जनविरोध जारी है. अगर अमेरिका वहां प्रभाव जमाता है, तो भारत को भी अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को साधने का मौका मिल सकता है.
बलूचिस्तान... पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे उपेक्षित प्रांत, लेकिन इसके सीने में छिपा है एक ऐसा खजाना, जो आने वाले वर्षों में दुनिया की राजनीति और भू-रणनीति का केंद्र बन सकता है. यहां छिपे हैं वे दुर्लभ खनिज जो आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी हैं.
इन्हीं खनिजों ने अब अमेरिका को आकर्षित कर लिया है, और वह बलूचिस्तान में चीन की पकड़ को ढीला कर खुद को स्थापित करने की तैयारी में है. यह बदलाव पाकिस्तान, अमेरिका, चीन और भारत – सभी के लिए बड़े भू-राजनीतिक मायने रखता है.
बलूचिस्तान में गड़ा है कौन सा खजाना?
बलूचिस्तान में मौजूद तांबा, लिथियम, सोना और दुर्लभ पृथ्वी खनिज आज वैश्विक शक्तियों की प्राथमिकता बन गए हैं. पाकिस्तान ने हाल ही में 'पाकिस्तान मिनरल्स इन्वेस्टमेंट फोरम 2025' का आयोजन कर इन खनिजों की वैश्विक नीलामी का संकेत दिया.
अमेरिका की क्यों है इसमें इतनी दिलचस्पी
यहां अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और यूरोपीय देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए. इस मौके पर अमेरिका की ओर से एरिक मेयर ने पाकिस्तान सेना प्रमुख असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से मुलाकात कर स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अब बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों में साझेदारी चाहता है.
अमेरिका की इस पहल को केवल आर्थिक निवेश समझना भूल होगी. यह एक रणनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य चीन की खनिज आपूर्ति पर निर्भरता को कम करना है.
चीन का कंट्रोल
फिलहाल चीन 69% दुर्लभ खनिजों का खनन और 44% तांबे के रिफाइनिंग पर नियंत्रण रखता है. अमेरिका इस वर्चस्व को चुनौती देना चाहता है. यही वजह है कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने और खनिजों तक पहुंच बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं.
भारत के लिए कैसे एक अच्छा मौका?
हालांकि यह सब कुछ भारत के लिए भी एक रणनीतिक अवसर बन सकता है. बलूचिस्तान में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ लंबे समय से जनविरोध जारी है. अगर अमेरिका वहां प्रभाव जमाता है, तो भारत को भी अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को साधने का मौका मिल सकता है.
बलूचिस्तान के खनिजों की दौड़ सिर्फ संसाधनों की लड़ाई नहीं है, यह आने वाले दशकों की तकनीकी प्रभुत्व की जंग का शुरुआती अध्याय है. अमेरिका अब इस जंग में चीन को पछाड़ने और दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है.
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