मुंबई ने क्यों बदला ठाकरे युग? बीएमसी के नतीजों ने कैसे खोली राजनीति की परतें

बीएमसी चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि मुंबई की राजनीति अब केवल विरासत और भावनाओं के भरोसे नहीं चलती. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ भी मतदाताओं को साध नहीं सका.

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Reepu Kumari

जिस मुंबई में कभी बाला साहेब ठाकरे का एक इशारा सियासी दिशा तय करता था, उसी शहर ने इस बार ठाकरे परिवार से दूरी बना ली. बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने मतभेद भुलाकर साथ आने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयोग मतदाताओं को भरोसा नहीं दिला पाया.

बीएमसी नतीजों ने यह संकेत दिया कि मुंबई का वोटर अब भावनाओं से ज्यादा स्थिर राजनीति, स्पष्ट नेतृत्व और ठोस दिशा चाहता है.

बीएमसी का महत्व और सत्ता परिवर्तन

1865 में स्थापित बृहन्मुंबई महानगरपालिका केवल एक नगर निकाय नहीं है. यह देश का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका वार्षिक बजट 74 हजार करोड़ रुपये से अधिक है. शिवसेना 1985 से बीएमसी पर शासन कर रही थी. करीब चार दशक बाद सत्ता का बदलना इस बात का संकेत है कि शहरी मतदाता अब परंपरा से आगे बढ़ चुका है और प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है.

ठाकरे भाइयों का गठबंधन क्यों नहीं चला

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने बीएमसी चुनाव से पहले आपसी दुश्मनी खत्म की. साथ तस्वीरें खिंचीं और यह संदेश देने की कोशिश हुई कि दोनों के एक होने से मुंबई एकजुट हो जाएगी. लेकिन मतदाता इस गठबंधन को अवसरवादी मान बैठा. कांग्रेस और शरद पवार को दरकिनार करने का फैसला भी गठबंधन की विश्वसनीयता पर सवाल बन गया.

हार के बाद बयानों ने बढ़ाया भ्रम

नतीजों के बाद शिवसेना यूबीटी के सांसद संजय राउत ने एकनाथ शिंदे को जयचंद बताते हुए सोशल मीडिया पर तीखा हमला किया. इस प्रतिक्रिया में आत्ममंथन की बजाय आरोपों का स्वर ज्यादा रहा. इससे यह संदेश गया कि पार्टी हार के कारणों को समझने के बजाय दोषारोपण में उलझी हुई है.

लोकसभा से विधानसभा तक टूटा भरोसा

2024 लोकसभा चुनाव में विपक्ष की एकजुटता से उद्धव ठाकरे को अच्छा प्रदर्शन मिला. इसके बाद यह धारणा बन गई कि जीत का श्रेय उन्हें ही जाता है. विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन में खटास बढ़ी और अकेले चुनाव लड़ने की धमकी ने नुकसान पहुंचाया. यही दरार बीएमसी चुनाव तक पहुंच गई और मतदाता दूर होता चला गया.

बीजेपी के लिए क्यों है यह बड़ी गुड न्यूज

बीजेपी के लिए बीएमसी जीत सिर्फ एक नगर निगम की सत्ता नहीं है. इससे ठाकरे बंधुओं और चाचा-भतीजे की राजनीति दोनों प्रयोग खत्म होते दिखे. बीजेपी ने 29 नगर निकायों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और कांग्रेस और कमजोर हुई है. साफ है कि इन नतीजों ने महाराष्ट्र की भविष्य की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं.