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जम्मू-कश्मीर में मिला था लीथियम का अथाह भंडार, कोई खरीदने को तैयार क्यों नहीं हो रहा है? समझिए क्या है समस्या 

Lithium Ore: लगभग डेढ़ साल पहले जम्मू-कश्मीर के रियासी में लीथियम का अथाह भंडार मिलने की खबर सामने आई थी. उसके बाद से इन खदानों की नीलामी के दो प्रयास हो चुके हैं लेकिन अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिली है. भारत सरकार का खनन मंत्रालय दो बार नीलामी करवा चुका है लेकिन दोनों बार कामयाबी नहीं मिली है. अब सरकार इसके लिए अलग तरह के विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर हो गई है.

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21वीं सदी में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का चलन तेजी से बढ़ा है. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर शिफ्ट होती दुनिया के लिए जो चीज सबसे अहम है, वह लीथियम आयन है. मोबाइल से लेकर बैटरी से चलने वाले प्लेन तक में इसी का इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में जब जम्मू-कश्मीर के रियासी में लीथियम का भंडार मिलने की पुष्टि हुई थी तब यह माना जा रहा था कि भारत इसके बाद बाकी देशों से एक कदम आगे निकल जाएगा. हालांकि, भारत की कोशिशों को दो झटके लग चुके हैं. लीथियम के खनन के लिए दो बार नीलामी करवाई जा चुकी है लेकिन इसके लिए खरीदार ही तैयार नहीं हैं. इसमें कई समस्याएं आ रही हैं जिसकी वजह से यह प्लान खटाई में पड़ता दिख रहा है.

केंद्रीय खनन मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के रियासी में मौजूद इस क्षेत्र को खनन के लिए नीलामी पर रखा लेकिन दो प्रयासों के बावजूद अब तक कामयाबी नहीं मिली है. लगभग डेढ़ साल पहले इसी मंत्रालय ने ऐलान किया था कि रियासी क्षेत्र में 59 लाख टन लीथियम अयस्क मौजूद है. दो प्रयासों में विफलता मिलने के बाद अब यह विभाग और इसके अधिकारी नए सिरे से सोचने पर मजबूर हो गए हैं. पहली बार 13 मार्च को नीलामी की गई और दूसरी बार अभी एक हफ्ते पहले ही नीलामी का प्रयास हुआ लेकिन दोनों ही बार नाकायमबी मिली.

इसके बारे में मंत्रालय का कहना है कि नीलामी की प्रक्रिया पूरी मानी जाने के लिए बोली लगाने वाले कम से कम जितने लोगों की जरूरत होती है, वह पूरी नहीं हुई. बाकी किसी भी खदान की नीलामी की तरह इसमें भी यह संख्या पूरा करना जरूरी है. ऐसे में अब सरकार इसके लिए अलग विकल्पों पर भी विचार कर सकती है. कहा जा रहा है कि अब सरकार इसकी नीलामी न करके, माइन्स एंड मिनरल्स ऐक्ट के प्रावधानों के मुताबिक, इसे किसी सरकारी कंपनी को भी देने पर विचार कर सकती है.

क्यों नहीं मिल पा रहे हैं खरीदार?

दरअसल, भारत में इस तरह के अयस्कों के खनन के लिए नीलामी पहली बार हो रही है. रियासी में मिलने वाले पत्थरों को खोदना और उसमें से लीथियम निकालना काफी चुनौतियों भरा है. इसके अलावा, इसको लेकर जानकारी का भी अभाव है. रिपोर्ट के मुताबिक, पहली नीलामी के दौरान इसमें हिस्सा लेने वालों की शिकायत थी कि जानकारी कम है और जिन ब्लॉक की नीलामी हो रही है वे बहुत छोटे हैं. साथ ही, इसके बारे में कोई स्टडी भी नहीं की गई है.

मौजूदा समय में भारत ने जो नियम बनाए हैं वे यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क क्लासिफिकेशन ऑफ रिसोर्सेज (UNFC) पर आधारित हैं. इस क्लासिफिकेशन के आधार पर यह नहीं पता चल पाता है कि जिस खदान से खनन करवाया जाना है वह आर्थिक रूप से कितनी फायदेमंद होगी. वहीं, दुनिया की ज्यादातर खनन कंपनियां और संस्थानएं कमेटी फॉर मिनरल रिजर्व्स इंटरनेशनल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (CRIRSCO) को तरजीह देती हैं. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत को निवेशकों को रिझाना है तो उसे CRIRSCO को अपनाना होगा.

हालांकि, देश के दूसरे राज्यों जैसे कि छत्तीसगढ़, मणिपुर और लद्दाख में भी जहां लीथियम के भंडार पाए गए हैं, वहां भी कई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं. ऐसे में लीथियम के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए अभी और इंतजार करना पड़ सकता है.