कौन थे नीलम संजीव रेड्डी, जिसने लोकसभा स्पीकर बनते ही छोड़ दी 33 साल पुरानी पार्टी, वजह जान करेंगे गर्व
Who is Neelam Sanjiva Reddy: नीलम संजीव रेड्डी भारतीय राजनीति के वो शख्स थे जिन्होंने 1977 से 1982 तक भारत के छठे राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया. हाालंकि इससे पहले वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष भी थे. लेकिन उन्होंने बतौर राजनेता कैसे आदर्शों का पालन किया जाता है इसकी मिसाल अपने लोकसभा स्पीकर बनते ही दे दी थी. आखिर कैसे, वो हम बताते हैं.
Who is Neelam Sanjiva Reddy: देश में 18वीं लोकसभा का आगाज हो गया है जिसमें भृतहरि महताब को प्रोटेम स्पीकर के रूप में चुना गया है. हालांकि 18वीं लोकसभा का पहला सत्र 24 जून से 3 जुलाई तक चलेगा, जिसके दौरान सदन के नए अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा. हर पार्टी चाह रही है कि ये पद उनकी पार्टी के नेता को मिले या फिर किसी ऐसे पॉलिटिकल लीडर को चुना जाए जिससे उनकी पार्टी को ज्यादा से ज्यादा फायदा हो.
जहां एक ओर एनडीए और इंडिया गठबंधन की पार्टियों के बीच इस पद के लिए सियासी गुणा-भाग जारी है तो वहीं आज हम आपको एक ऐसे राजनेता के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने लोकसभा स्पीकर के पद की शपथ लेते ही अपनी 33 साल पुरानी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. कौन हैं ये नेता और उनके इस फैसले का क्या कारण था, आज हम आपको इस बारे में बताएंगे.
देश के चौथे लोकसभा स्पीकर थे नीलम संजीव रेड्डी
हम बात कर रहे हैं देश के छठे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की जिन्होंने आपातकाल के बाद 1977 से 1982 तक देश के प्रथम नागरिक की जिम्मेदारी संभाली. हालांकि इससे पहले ही वो अपने राजनीतिक जीवन में आंध्र प्रदेश के सीएम और लोकसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुके थे. नीलम संजीव रेड्डी को लोकसभा के चौथे अध्यक्ष के रूप में चुना गया था जिन्होंने दो कार्यकाल तक लोकसभा की देख-रेख की.
कांग्रेस पार्टी के मुख्य नेता रहे रेड्डी ने मार्च 1967 में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली जो जुलाई 1969 तक चली तो वहीं दूसरा कार्यकाल मार्च 1977 से जुलाई 1977 तक रहा. भारत के संसदीय इतिहास में नीलम संजीव रेड्डी इकलौते लोकसभा अध्यक्ष हैं जिन्होंने पद संभालते ही अपनी पार्टी कांग्रेस से 33 साल पुराने रिश्ते को तोड़ दिया और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से ऑफिशियल इस्तीफा दे दिया.
तो इस वजह से पार्टी से दिया था इस्तीफा
हालांकि यहां सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था जिसके चलते नीलम संजीव रेड्डी को ये फैसला लेना पड़ा. इसका जवाब उन्होंने तत्कालीन समाचार पत्रों से बात करते हुए दिया था. उनका मानना था कि लोकसभा में अध्यक्ष का संबंध सभी दलों से चुनकर आए नेताओं की सभा से होता है, वह लोकसभा में मौजूद हर सदस्य का प्रतिनिधित्व करता है, ऐसे में अगर वो किसी एक दल से जुड़ा रहता है तो वो बाकी दल के सदस्यों के प्रति अपनी ईमानदारी रख पाने में मुश्किलों का सामना कर सकता है. ऐसे में उसे कोशिश करनी चाहिए कि वह सभी दलों से जुड़े किसी एक दल से नहीं.
सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुने जाने वाले इकलौते लीडर
नीलम संजीव रेड्डी भारत के राजनीतिक इतिहास के इकलौते लोकसभा अध्यक्ष थे जिन्हें उनकी इसी सोच के चलते आगे चलकर सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुना गया. जब नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति चुना गया गया तो उनकी जगह पर डॉ गुरदयाल सिंह ढिल्लों को अगस्त 1969 में सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया जो कि तत्कालीन समय में सबसे कम उम्र को लोकसभा अध्यक्ष बने.
संजीव रेड्डी की तरह ही कांग्रेस नेता गुरदयाल सिंह ढिल्लों को भी दो बार लोकसभा अध्यक्ष के रूप में काम करने का मौका मिला. उनका पहला कार्यकाल अगस्त 1969 से मार्च 1971 तक और दूसरा मार्च 1971 से दिसंबर 1975 तक रहा. हालांकि इसके बाद देश में आपातकाल लागू हो गया जो कि 21 महीनों तक लागू रहा.