UGC रूल्स के सेक्शन-3 में क्या है 'विवादित प्रावधान'? जिसको लेकर केंद्र सरकार से आर-पार की लड़ाई को तैयार है सवर्ण समाज
UGC के नए रूल्स को लेकर सवर्ण समाज के लोगों में सरकार को लेकर खासा उबाल देखने को मिल रहा है. इस मुद्दे को लेकर जहां सवर्ण समाज पूरी तरह से एकजुट नजर आ रहा है, वही बीजेपी के साथ-साथ अन्य पार्टियां भी इस पर कुछ भी कहने से बच रही है.
नई दिल्ली: UGC के नए प्रावधानों को लेकर सवर्ण समाज का आक्रोश चरम पर है और सवर्ण समाज के कई संगठनों ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इस मामले को लेकर सवर्णों का विरोध प्रदर्शन अब बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है और पार्टी के कोई भी नेता इसपर खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी के साथ-साथ विपक्षी पार्टियों के नेता भी इस मामले पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं. वही इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि UGC रूल्स के सेक्शन 3 (C) में आखिर ऐसा क्या है, जिससे सवर्ण समाज के लोगों में उबाल देखने को मिल रहा है.
गौरतलब है कि यूजीसी रूल्स 2026 को 15 जनवरी से लागू कर दिया, जिसका क्रियान्यवन देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान रूप से होगा. इस नए रूल्स के सेक्शन 3 (C) में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा बताई गई है, जिसमें लिखा गया है कि 'जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है.' इसी को लेकर आपत्ति जताई जा रही है.
सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का क्या कहना है?
UGC के इस नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस तरह यूजीसी ने एससी, एसटी और ओबीसी को तो किसी भी तरह के भेदभाव से बचाव का रास्ता दिया है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कुछ नहीं कहा गया है. सवर्ण समाज की आपत्ति इस बात पर भी है कि यदि शिकायत गलत पाई जाती है तो फिर झूठी रिपोर्ट करने वाले के खिलाफ किसी तरह के ऐक्शन का प्रावधान नहीं है. ऐसे में चिंता जाहिर की जा रही है कि यदि झूठी शिकायत पर ऐक्शन का प्रावधान नहीं होगा तो झूठी शिकायतों के मामले बढ़ जाएंगे और सामान्य वर्ग के छात्रों को परेशान करने का यह उपकरण बन जाएगा.
शिक्षण संस्थानों के लिए क्या हैं गाइडलाइन?
UGC के इस नए नियम के तहत सभी संस्थानों को समान अवसर केंद्र का गठन करना होगा. इसके अलावा एक समता हेल्पलाइन भी बनानी होगी, जिस पर कभी भी कोई शिकायत कर सकता है. इसके अलावा जांच कमेटी गठित करने और यदि संज्ञेय अपराध हो तो पुलिस तक को मामला सौंपे जाने की बात कही गई है. इसको लेकर भी आपत्ति है कि आखिर विश्वविद्यालय कैंपसों में पुलिस की एंट्री कैसे हो सकती है.
क्या है सवर्ण समाज के लोगों की मांग?
सवर्ण संगठनों की मांग यह भी है कि आखिर सामान्य वर्ग के लोगों को भी इस कानून के तहत संरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता. दलील यह है कि जैसे एससी, एसटी और ओबीसी के छात्र भेदभाव का शिकार हो सकते हैं, वैसे ही सवर्ण छात्र भी भेदभाव का शिकार हो सकते हैं. ऐसे में उन्हें भी शिकायत करने का वैसा ही अधिकार मिले. इसके अतिरिक्त झूठी शिकायतों के मामले में शिकायत करने वाले के खिलाफ जुर्माने या अन्य कार्रवाई के प्रावधान की भी मांग हो रही है. इस तरह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर जो प्रावधान है, उस पर ही सवर्णों के एक वर्ग को बड़ी आपत्ति है.
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