सामान्य अदालत से कितनी अलग होती है फास्ट ट्रैक कोर्ट? जानें इसका उद्देश्य
फास्ट ट्रैक कोर्ट विशेष अदालतें हैं, जिनका उद्देश्य गंभीर और संवेदनशील मामलों का समयबद्ध निपटारा करना है. इनमें लगातार सुनवाई, सीमित स्थगन और प्राथमिकता के आधार पर मामलों का निपटारा किया जाता है.
नई दिल्ली: नीट पेपर लीक को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच फास्ट ट्रैक कोर्ट की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है. सरकार ने परीक्षा पेपर लीक जैसे मामलों की जल्द सुनवाई और दोषियों को शीघ्र सजा दिलाने के उद्देश्य से फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की बात कही है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होती है और इसकी कार्यप्रणाली सामान्य अदालतों से किस तरह अलग होती है.
फास्ट ट्रैक कोर्ट विशेष अदालतें होती हैं, जिन्हें गंभीर और संवेदनशील मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के लिए बनाया जाता है. इनका उद्देश्य लंबे समय से लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा करना और समय पर न्याय सुनिश्चित करना होता है. समय पर न्याय का सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की न्यायिक व्याख्या से जुड़ा माना जाता है. इसी आधार पर अदालतों ने कई मामलों में शीघ्र सुनवाई के महत्व पर जोर दिया है.
सामान्य अदालतों से कितना है अलग?
इन अदालतों में सामान्य अदालतों की तरह ही कानून और न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है, लेकिन सुनवाई तय समय सीमा के भीतर पूरी करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है. अनावश्यक देरी से बचने के लिए मामलों की लगातार सुनवाई की जाती है, जिससे फैसला अपेक्षाकृत कम समय में आ सके.
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क्या है नियम?
फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना के लिए केंद्र या राज्य सरकार प्रशासनिक प्रस्ताव तैयार करती है. हालांकि न्यायपालिका स्वतंत्र होने के कारण सरकार सीधे ऐसी अदालत शुरू नहीं कर सकती. इसके लिए संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय की सहमति आवश्यक होती है. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी मिलने के बाद किसी न्यायाधीश को विशेष रूप से इन मामलों की सुनवाई के लिए नामित किया जाता है.
फास्ट ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालत के बीच सबसे बड़ा अंतर सुनवाई की गति है. सामान्य अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों के कारण तारीखों के बीच कई सप्ताह या महीनों का अंतर हो सकता है. इसके विपरीत फास्ट ट्रैक कोर्ट में लगातार सुनवाई होती है ताकि मुकदमे का निपटारा जल्द हो सके.
क्या है इसका उद्देश्य?
इन अदालतों में सुनवाई टालने की गुंजाइश भी काफी सीमित होती है. केवल विशेष परिस्थितियों में ही स्थगन दिया जाता है, जिससे मामले अनावश्यक रूप से लंबित न रहें. इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाना है.
फास्ट ट्रैक कोर्ट केवल चुनिंदा और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करती हैं. इनमें महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, पॉक्सो अधिनियम से जुड़े मामले, आतंकवाद, बड़े दंगे, भ्रष्टाचार तथा सरकार या न्यायपालिका द्वारा प्राथमिकता वाले अन्य मामलों को शामिल किया जाता है. आवश्यकता पड़ने पर किसी विशेष प्रकार के अपराध, जैसे परीक्षा पेपर लीक, के मामलों की सुनवाई के लिए भी ऐसी अदालतें नामित की जा सकती हैं.