'यह कांग्रेस रेडियो है...' जब 'सीक्रेट आवाज' से हिल गई थी ब्रिटिश हुकूमत; जानिए उषा मेहता के गुप्त मिशन की अनसुनी कहानी

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उषा मेहता ने गुप्त 'कांग्रेस रेडियो' शुरू कर अंग्रेजी सेंसरशिप को चुनौती दी. बिना मोबाइल और इंटरनेट यह रेडियो पूरे देश में आजादी के संदेश पहुंचाता रहा और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ताकत देता रहा.

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Kanhaiya Kumar Jha

1942 का साल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे उथल-पुथल भरे वर्षों में गिना जाता है. यह वह दौर था जब देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुस्सा अपने चरम पर था. 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (वर्तमान अगस्त क्रांति मैदान) से महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का आह्वान करते हुए देशवासियों से एक ही मंत्र अपनाने को कहा- 'करो या मरो'.

अंग्रेज सरकार ने इस आंदोलन को शुरू होते ही कुचलने की कोशिश की. 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. सरकार को विश्वास था कि नेतृत्व जेल में पहुंचते ही आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा. लेकिन हुआ ठीक इसके उलट. देशभर में स्वतःस्फूर्त विरोध शुरू हो गया. हजारों युवा, छात्र और आम नागरिक आंदोलन की कमान संभालने के लिए आगे आए. इसी दौर में एक ऐसी युवा छात्रा सामने आई, जिसने बंदूक या बम नहीं, बल्कि एक रेडियो के जरिए अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती दी. उनका नाम था उषा मेहता.

जब सच्चाई पर लगा था पहरा

आज सूचना कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच जाती है. लेकिन 1942 में ऐसा कोई साधन नहीं था. न मोबाइल फोन थे, न इंटरनेट और न सोशल मीडिया. उस समय आम लोगों तक समाचार पहुंचाने के मुख्य साधन अखबार और रेडियो थे. दोनों पर अंग्रेज सरकार का कड़ा नियंत्रण था. समाचार प्रकाशित होने से पहले उनकी जांच होती थी और सरकार के खिलाफ कोई भी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचने दी जाती थी. सरकारी रेडियो केवल वही प्रसारित करता था जो ब्रिटिश प्रशासन चाहता था. कई जगह आंदोलन चल रहे थे, लोग गिरफ्तार हो रहे थे, प्रदर्शन हो रहे थे, लेकिन इन घटनाओं की सच्चाई आम जनता तक नहीं पहुंच रही थी. यहीं से एक नए विचार ने जन्म लिया—अगर सरकारी रेडियो सच्चाई नहीं बताएगा, तो अपना रेडियो बनाया जाएगा.


कौन थीं उषा मेहता?

25 मार्च 1920 को गुजरात में जन्मी उषा मेहता बचपन से ही राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थीं. कहा जाता है कि महज आठ वर्ष की आयु में उन्होंने महात्मा गांधी के विचार सुने और तभी से स्वतंत्रता आंदोलन की ओर आकर्षित हो गईं. 1942 में वह मुंबई में पढ़ाई कर रही थीं. नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने महसूस किया कि आंदोलन को जीवित रखने के लिए सबसे जरूरी है लोगों तक सही सूचना पहुंचाना. इसी सोच ने उन्हें एक ऐसे साहसिक अभियान की ओर बढ़ाया, जिसकी कल्पना भी अंग्रेज सरकार ने नहीं की थी.

एक गुप्त रेडियो स्टेशन की शुरुआत

उषा मेहता ने अपने कुछ विश्वसनीय साथियों और रेडियो तकनीक की जानकारी रखने वाले लोगों की मदद से एक गुप्त रेडियो स्टेशन स्थापित किया. इसमें प्रमुख सहयोगियों में विट्ठलभाई झावेरी, बाबूभाई खाखर और तकनीकी विशेषज्ञ चंद्रकांत झावेरी जैसे लोग शामिल थे. 27 अगस्त 1942 को इस गुप्त रेडियो से पहला प्रसारण हुआ. इसे बाद में 'कांग्रेस रेडियो' या 'सीक्रेट कांग्रेस रेडियो' के नाम से जाना गया.

हर प्रसारण की शुरुआत एक ऐसे वाक्य से होती थी, जिसने अंग्रेज अधिकारियों की बेचैनी बढ़ा दी—'यह कांग्रेस रेडियो है... भारत में कहीं से बोल रहा है.' इन शब्दों में ही सबसे बड़ा रहस्य छिपा था. प्रसारण कहां से हो रहा है, इसका पता अंग्रेजों को नहीं चल पाता था.

बिना इंटरनेट आखिर पूरे देश तक कैसे पहुंचती थी यह आवाज?

आज के समय में यह सवाल स्वाभाविक लगता है कि जब इंटरनेट और मोबाइल नहीं थे, तब एक रेडियो पूरे देश तक संदेश कैसे पहुंचाता था? दरअसल, कांग्रेस रेडियो शॉर्ट-वेव (Shortwave) ट्रांसमीटर के जरिए प्रसारण करता था. शॉर्ट-वेव रेडियो तरंगें लंबी दूरी तक पहुंच सकती थीं. जिन लोगों के पास ऐसे रेडियो रिसीवर थे, वे इन प्रसारणों को सुन लेते थे. इसके बाद असली काम शुरू होता था.

स्वतंत्रता सेनानी इन समाचारों को हाथ से लिखते, पर्चे तैयार करते, गुप्त बैठकों में सुनाते और गांव-गांव जाकर लोगों तक पहुंचाते. कई जगह एक व्यक्ति रेडियो सुनता और फिर दर्जनों लोगों को वही समाचार सुनाता. इस तरह एक प्रसारण हजारों लोगों तक पहुंच जाता था. यानी यह केवल रेडियो नहीं था, बल्कि सूचना का एक ऐसा नेटवर्क था जो भरोसे, साहस और लोगों की भागीदारी पर चलता था.

क्या सुनाया जाता था कांग्रेस रेडियो पर?

कांग्रेस रेडियो केवल भाषण सुनाने का माध्यम नहीं था. इसका उद्देश्य लोगों तक वह सच्चाई पहुंचाना था जिसे अंग्रेज सरकार दबाने की कोशिश कर रही थी. इसमें देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आंदोलनों की जानकारी दी जाती थी. नेताओं के संदेश सुनाए जाते थे. पुलिस की कार्रवाई, गिरफ्तारियों और जनता के प्रतिरोध की खबरें साझा की जाती थीं.

महात्मा गांधी के विचार, स्वतंत्रता सेनानियों की अपील और जनता का मनोबल बढ़ाने वाले संदेश भी प्रसारित किए जाते थे. कई बार अलग-अलग प्रांतों से गुप्त तरीके से प्राप्त सूचनाएं पूरे देश तक पहुंचाई जाती थीं. इससे आंदोलन में शामिल लोगों को यह भरोसा मिलता था कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि पूरा देश संघर्ष कर रहा है.

अंग्रेज सरकार की सबसे बड़ी परेशानी बन गया यह रेडियो

ब्रिटिश प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि प्रसारण हर कुछ दिनों में अलग-अलग स्थानों से किया जाता था. उषा मेहता और उनके साथी लगातार अपना ठिकाना बदलते रहते थे. कभी किसी निजी मकान से, कभी किसी कार्यालय से और कभी किसी अन्य सुरक्षित स्थान से प्रसारण किया जाता था. इस वजह से पुलिस बार-बार असफल होती रही. लगभग तीन महीने तक अंग्रेज सरकार इस गुप्त रेडियो को बंद नहीं कर सकी.

तकनीक के सहारे आखिर पहुंच गई पुलिस

ब्रिटिश प्रशासन ने रेडियो सिग्नल पकड़ने वाले विशेष उपकरणों और वायरलेस विशेषज्ञों की मदद ली. लगातार निगरानी और तकनीकी खोजबीन के बाद 12 नवंबर 1942 को मुंबई में उस स्थान का पता लगा लिया गया जहां से कांग्रेस रेडियो का प्रसारण हो रहा था. पुलिस ने वहां छापा मारा, रेडियो उपकरण जब्त कर लिए और उषा मेहता सहित उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद उनसे लंबी पूछताछ की गई. उन पर दबाव भी बनाया गया, लेकिन उन्होंने अपने साथियों और आंदोलन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी उजागर नहीं की. बाद में उन्हें जेल की सजा सुनाई गई.

सिर्फ कुछ महीने चला, लेकिन इतिहास बदल गया

कांग्रेस रेडियो का संचालन लगभग ढाई से तीन महीने तक ही हो सका. समय भले ही कम था, लेकिन इसका प्रभाव बेहद गहरा था. इसने साबित कर दिया कि किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत केवल नेता नहीं, बल्कि सही सूचना और जनता का विश्वास होता है. अंग्रेज सरकार समाचारों पर नियंत्रण करके आंदोलन को रोकना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस रेडियो ने उस कोशिश को काफी हद तक विफल कर दिया. 

इतिहासकार मानते हैं कि इस गुप्त रेडियो ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्ष कर रहे लोगों के बीच मनोवैज्ञानिक और सूचनात्मक संपर्क बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

आज भी क्यों प्रेरित करती है यह कहानी?

आज जब एक संदेश दुनिया के किसी भी कोने में कुछ ही सेकंड में पहुंच जाता है, तब यह कल्पना करना भी कठिन है कि 1942 में कुछ युवाओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेज साम्राज्य के सूचना तंत्र को चुनौती दे दी थी.

उषा मेहता का कांग्रेस रेडियो केवल एक गुप्त प्रसारण केंद्र नहीं था, बल्कि वह आजादी की आवाज था. उसने यह साबित किया कि जब सच बोलने के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएं, तब साहस खुद अपना रास्ता बना लेता है.

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का यह अध्याय आज भी याद दिलाता है कि किसी भी बड़े परिवर्तन के लिए केवल हथियार नहीं, बल्कि विचार, सूचना और अटूट हिम्मत भी उतनी ही जरूरी होती है.