ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाला वो गुप्त मिशन, जो आखिरी वक्त पर हो गया फेल; जानिए गदर विद्रोह की अनसुनी कहानी

1915 का गदर विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सुनियोजित सशस्त्र क्रांति का प्रयास था. मुखबिर के कारण योजना विफल हो गई, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई प्रेरणा और क्रांतिकारी दिशा दी.

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Kanhaiya Kumar Jha

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है तो 1857 की क्रांति, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और महात्मा गांधी जैसे नाम सबसे पहले याद आते हैं. लेकिन इतिहास में एक ऐसा प्रयास भी हुआ था, जो यदि सफल हो जाता तो संभव है कि भारत की आजादी का इतिहास बिल्कुल अलग होता. यह था 1915 का गदर विद्रोह.

यह केवल कुछ लोगों का आंदोलन नहीं था, बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों और भारत के भीतर मौजूद क्रांतिकारियों की एक संगठित योजना थी. इसका उद्देश्य ब्रिटिश भारतीय सेना में बड़े पैमाने पर विद्रोह कराकर अंग्रेजी शासन को गिराना था.

गदर पार्टी की शुरुआत कैसे हुई?

गदर पार्टी की स्थापना 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में भारतीय प्रवासियों ने की थी. उस समय बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर अमेरिका और कनाडा में काम करते थे. वहां उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता था और वे भारत की गुलामी से भी दुखी थे. गदर पार्टी का उद्देश्य साफ था, सशस्त्र क्रांति के जरिए भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना.


इस आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं में लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, कर्तार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले और बाद में रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारी शामिल हुए.

प्रथम विश्व युद्ध ने क्यों दिया बड़ा मौका?

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ. ब्रिटेन अपनी सेना और संसाधनों का बड़ा हिस्सा यूरोप के युद्ध में लगा चुका था. गदर पार्टी के नेताओं को लगा कि यही सही समय है जब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा विद्रोह किया जा सकता है.

उन्होंने दुनिया के अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीयों से अपील की कि वे भारत लौटें और आजादी की लड़ाई में शामिल हों. हजारों भारतीय भारत वापस आए. इनमें कई पूर्व सैनिक और युवा क्रांतिकारी भी थे.

क्या थी विद्रोह की योजना?

योजना बेहद साहसिक थी. क्रांतिकारियों का लक्ष्य था कि ब्रिटिश भारतीय सेना की विभिन्न छावनियों में एक ही समय पर विद्रोह कराया जाए. लाहौर, फिरोजपुर, मेरठ, रावलपिंडी, मियां मीर, बनारस, आगरा और अन्य सैन्य ठिकानों के भारतीय सैनिकों से संपर्क किया गया. योजना यह थी कि सैनिक अपने अंग्रेज अधिकारियों को गिरफ्तार या निष्क्रिय कर हथियारों पर कब्जा कर लें और पूरे देश में क्रांति की शुरुआत हो जाए. इस अभियान का समन्वय रासबिहारी बोस और उनके साथियों ने संभाला. शुरुआत में विद्रोह की तारीख 21 फरवरी 1915 तय की गई थी.

अंग्रेजों तक कैसे पहुंच गई पूरी जानकारी?

यही वह मोड़ था जिसने पूरी योजना को विफल कर दिया. गदर पार्टी के भीतर मौजूद एक व्यक्ति कृपाल सिंह ब्रिटिश पुलिस का मुखबिर बन गया. उसने विद्रोह की पूरी जानकारी अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंचा दी. इतिहासकारों के अनुसार, उसकी दी गई सूचनाओं के कारण अंग्रेज पहले से सतर्क हो गए. क्रांतिकारियों को जब शक हुआ कि योजना लीक हो चुकी है, तो उन्होंने विद्रोह की तारीख बदलने की कोशिश की. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अंग्रेजों ने कैसे नाकाम किया विद्रोह?

ब्रिटिश प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी. सैन्य छावनियों की सुरक्षा बढ़ा दी गई, संदिग्ध सैनिकों को निहत्था कर दिया गया और बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. जिन स्थानों पर विद्रोह शुरू होने की संभावना थी, वहां पहले ही सेना तैनात कर दी गई. इस कारण देशव्यापी विद्रोह शुरू होने से पहले ही दबा दिया गया.

इसके बाद क्या हुआ?

  • विद्रोह विफल होने के बाद अंग्रेज सरकार ने कठोर दमन शुरू किया.
  • सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया. कई मुकदमे चलाए गए, जिन्हें लाहौर षड्यंत्र केस (Lahore Conspiracy Cases) के नाम से जाना जाता है.
  • इन मुकदमों में कई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई और अनेक लोगों को आजीवन कारावास या अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया.
  • सिर्फ 19 वर्ष के कर्तार सिंह सराभा को भी फांसी दे दी गई. बाद में भगत सिंह उन्हें अपना आदर्श मानते थे और उनकी तस्वीर अपने पास रखते थे.
  • रासबिहारी बोस गिरफ्तारी से बच निकले और बाद में जापान चले गए. आगे चलकर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को विदेश से मजबूत किया और बाद में वही आधार बना, जिस पर आगे चलकर आजाद हिंद फौज के गठन का रास्ता तैयार हुआ.

क्या वास्तव में अंग्रेजी शासन हिल सकता था?

इतिहास में 'अगर ऐसा होता' का निश्चित उत्तर देना संभव नहीं है. लेकिन अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि यदि ब्रिटिश भारतीय सेना की कई बड़ी छावनियों में एक साथ सफल विद्रोह हो जाता, तो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के लिए भारत पर नियंत्रण बनाए रखना बहुत कठिन हो सकता था. हालांकि यह कहना कि उसी समय भारत निश्चित रूप से स्वतंत्र हो जाता, ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं है. लेकिन इतना जरूर माना जाता है कि ब्रिटिश शासन को बहुत बड़ा सैन्य और राजनीतिक संकट झेलना पड़ता.

गदर विद्रोह का महत्व

भले ही 1915 का गदर विद्रोह अपने तत्काल उद्देश्य में सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी. इसने यह साबित किया कि भारत के बाहर रहने वाले भारतीय भी देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार थे. गदर आंदोलन ने आने वाली क्रांतिकारी पीढ़ी को प्रेरित किया और यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष केवल भारत की सीमाओं के भीतर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बसे भारतीयों के दिलों में भी चल रहा था.