Supreme Court का बड़ा फैसला: निजी फायदे के लिए पद का इस्तेमाल करने वाले जनप्रतिनिधियों पर सख्त टिप्पणी, गुजरात से जुड़ा है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात की महिला सरपंच मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि निजी स्वार्थ के लिए पद का दुरुपयोग नहीं कर सकते. अदालत ने हितों के टकराव को गंभीर बताते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम फैसला देकर जन प्रतिनिधियों के लिए सख्त संदेश देने का प्रयास किया है. जन प्रतिनिधियों ने सर्वोच्च अदालत के इस रुख को गंभीरता से नहीं लिया तो मुश्किल में फंस सकते हैं. अदालत ने साफ कहा है कि जनप्रतिनिधि अपने पद का इस्तेमाल निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए करते हैं तो यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अदालत ने यह टिप्पणी गुजरात की एक महिला सरपंच से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए की है.
जानिए क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के मुताबिक गुजरात की एक महिला सरपंच पर आरोप था कि उन्होंने अपने अपने पद का निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हुए पति की पार्टनरशिप वाली फर्म को ही ठेका दे दिया. ग्राम पंचायत का यह ठेका 13.52 लाख रुपये का था. मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में आया तो सरपंच को उनके पद से हटा दिया गया. सरपंच ने इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सरपंची बहाल करने की मांग की लेकिन हाई कोर्ट ने पद से हटाने कार्रवाई को सही मानते हुए जिला प्रशासन के फैसले को बरकरार रखा.
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरपंच
हाई कोर्ट से कोई राहत ने मिलने पर महिला सरपंच की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की गई. सर्वोच्च अदालत ने भी एसएलपी खारिज करते गुजरात हाई कोर्ट के फैसले का सही करार दे दिया. मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने साफ कहा कि पद के दुरुपयोग करते हुए महिला सरपंच ने अपने परिवार को आर्थिक लाख पहुंचाया, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता.
सर्वोच्च अदालत का सख्त रुख
मामले में सर्वोच्च अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यह मामला हितोंं के टकराव का है, इसलिए गंभीरता और बढ़ जाती है. यदि जनप्रतिनिधि के पति की फर्म को ठेका मिलेगा तो जाहिरतौर पर हितों का टकराव होगा, यह स्वभाविक है. मामले में राज्य सरकार ने भी अपना पक्ष रखा. राज्य सरकार ने कहा- गुजरात ग्राम पंचायत अधिनियम की धारा 30(1) (जी) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि ग्राम पंचायत के सरपंच या सदस्य निजी हित से जुड़े किसी कार्य में शामिल नहीं हो सकते. अदालत ने अपने फैसले में वीरेंद्र सिंह बनाम अतिरिक्त आयुक्त मामले का भी जिक्र किया. 2023 के इस मामले में एक जनप्रतिनिधि को अपने बेटे का ठेका देना के मामले में अयोग्य करार दिया गया था.