डीएमके-कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ने का असर केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा. इसका असर देश की राजनीति पर भी दिखना तय माना जा रहा है. सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के लिए आपदा बनकर आए इस मौके को बीजेपी अवसर बनाने के प्रयास में जुट गई है. उनका कहना है कि कांग्रेस से अलग होने के बाद डीएमके बीजेपी के नजदीक आ सकती है, और अगर ऐसा हुआ तो डीएमके राज्यसभा में बहुमत प्राप्त करने की दिशा में बीजेपी के लिए मददगार साबित हो सकती है.
तमिलनाडु में सत्ता छोड़कर विपक्ष में पहुंची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के साथ कांग्रेस का गठबंधन टूटने के बाद केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी अपने लिए संभावनाएं तलाश रही है. डीएमके के सहयोग से यह मौका बीजेपी के लिए राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा मजबूत करने में मददगार साबित हो सकता है. बीजेपी के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों पर डीएमके का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है. बता दें कि संसद में बहुमत के लिए बीजेपी को फिलहाल संसद में दो-तिहाई बहुमत के लिए 70 सांसदों की जरूरत है. परिसीमन वाले बिल को दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी, लेकिन एनडीए 54 वोट से पीछे रह गया था. डीएमके के 22 सांसदों ने भी इस बिल का विरोध किया था.
तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस गठबंधन को दरकाने का काम कांग्रेस के उस फैसले ने किया जब कांग्रेस अपनी गठबंधन पार्टनर डीएमके को छोड़कर थलापति विजय की पार्टी टीवीके के साथ जा खड़ी हुई. कांग्रेस के इस फैसले को डीएमके ने पीठ में छुरा घोंपना करार दिया है. तल्खी की इंतहां तक हो गई जब डीएमके ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग कर डाली.
सियासी जानकारों का मानना है कि डीएमके के तमिलनाडु में विपक्ष में जाने के बाद इस बात की संभावनाएं बढ़ गई हैं कि केंद्र में डीएमके सत्ता के साथ जाना चाहेगी, क्योंकि किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के सर्वाइवल के लिए जरूरी है कि वह राज्य या केंद्र में, कहीं तो सत्ता के साथ रहे. ट्रैक रिकॉर्ड की बात करें तो वह भी डीएमके को ऐसा करने से नहीं रोकता. अटल बिहारी वाजपेयी के समय में डीएमके एनडीए का हिस्सा रह चुकी है.
डीएमके के एनडीए में जाने की राह में कुछ बाधाएं भी हैं, इनसे भी डीएमके को पार पाना होगा. सबसे बड़ी बाधा है- डीएमके का परिसीमन प्लान का विरोध. संसद में सरकार के परिसीमन प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था, डीएमके सांसद इसके विरोध में न केवल काले कपड़े पहनकर संसद पहुंचे थे, बल्कि बिल की प्रति तक जला डाली थीं. स्टालिन अपनी उस स्थिति के साथ कैसे पैचअप करेंगे, यह देखने वाली बात होगी. दूसरी बड़ी बाधा उदयनिधि स्टालिन के सनातन की खिलाफत वाला बयान होगा.