'एडजस्ट करो' कहने पर ससुराल वालों पर नहीं चलेगा केस? सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, जानिए क्या है पूरा मामला?

दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए जनरल आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों के खिलाफ क्रमिनल केस नहीं चलाया जा सकता.

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Kuldeep Sharma

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के एक मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ किया है कि पत्नी द्वारा लगाए गए केवल सामान्य आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता. जजों ने कहा कि पति के परिवार वालों के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई करने से पहले साफ और पुख्ता सबूत होने बेहद जरूरी हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने शादीशुदा महिलाओं के साथ होने वाली क्रूरता और उत्पीड़न से निपटने वाली धारा 498ए के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है. कोर्ट ने कहा कि इस कानून का इस्तेमाल बिना किसी ठोस सबूत के पति के पूरे परिवार को निशाना बनाने वाले हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए.

मध्यप्रदेश के मामले में आया 'सुप्रीम' फैसला

दरअसल यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक परिवार से जुड़ा है. यहां एक महिला ने अपने पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी. इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ मामला रद्द करने से इनकार कर दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए रिश्तेदारों के खिलाफ चल रही सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया. यह अहम फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया है.

दहेज और मानसिक प्रताड़ना का लगाया था आरोप

शिकायत के अनुसार महिला की शादी नवंबर 2019 में हुई थी. इसके बाद जनवरी 2023 में उसने आईपीसी की धारा 498ए, धारा 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी. महिला का दावा था कि शादी में नकद, जेवर और घरेलू सामान सहित भारी दहेज दिया गया था. उसने अपने ससुराल वालों पर और दहेज मांगने तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया था. महिला ने इमोशनल एब्यूज, कैमरों से लगातार नजर रखने, आने-जाने पर पाबंदी लगाने और लाइसेंसी बंदूक से डराने-धमकाने जैसे कई आरोप लगाए थे.

निचली अदालतों को सुप्रमी कोर्ट ने दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में पति के परिवार के हर सदस्य को आरोपी बनाना एक आम बात हो गई है. जजों ने निचली अदालतों को सलाह दी कि वे रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पहले ऐसे मामलों की बारीकी से जांच करें. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति का साथ देना, समझौते की सलाह देना या विवाद में दखल न देना आपराधिक व्यवहार नहीं माना जा सकता. बिना मजबूत सबूतों के रिश्तेदारों पर सिर्फ इसलिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि वे पति के परिवार के सदस्य हैं. इस फैसले से उन बेगुनाह लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जिन्हें वैवाहिक विवादों में झूठे आरोपों का सामना करना पड़ता है.