'RTI एक्टिविज्म बन गया है नया धंधा', सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी; कार्यकर्ता को नहीं मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने के आरोपित आरटीआई कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया. अदालत ने टिप्पणी की कि आरटीआई एक्टिविज्म अब एक नया धंधा बनता जा रहा है.

Social Media
Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म का इस्तेमाल कई मामलों में गलत तरीके से किया जा रहा है. अदालत ने पंजाब के गुरदासपुर में सड़क निर्माण कार्य के दौरान कथित हस्तक्षेप और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोपों का सामना कर रहे आरटीआई कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी को राहत देने से इनकार कर दिया. इस मामले में अदालत की टिप्पणी और फैसला दोनों ही चर्चा का विषय बन गए हैं.

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनवाई के दौरान आरटीआई एक्टिविज्म पर कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि सरकारी परियोजनाओं की निगरानी के लिए निर्धारित एजेंसियां मौजूद हैं और हर व्यक्ति स्वयं को निगरानीकर्ता नहीं मान सकता. पीठ ने याचिकाकर्ता के दावों पर सवाल उठाते हुए उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया.

अग्रिम जमानत की मांग खारिज

राकेश कुमार बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनका कहना था कि उन्होंने निर्माण कार्य में कथित अनियमितताओं को उजागर किया था, इसलिए उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया. हालांकि सर्वोच्च अदालत इस तर्क से सहमत नहीं हुई और याचिका खारिज कर दी.


हाई कोर्ट ने भी नहीं दी थी राहत

इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी बहल को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और सरकारी कार्य में हस्तक्षेप की भूमिका सामने आती है. इसी आधार पर राहत देने से मना किया गया था.

क्या हैं आरोप?

एफआईआर के अनुसार, बहल और उनके सहयोगी राजीव कुमार उर्फ मिंटू पर सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने का आरोप है. शिकायत में कहा गया कि दोनों ने निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे व्यक्ति और वहां मौजूद मजदूरों को धमकाया. साथ ही अपमानजनक टिप्पणियां करने और मारपीट का भी आरोप लगाया गया.

पुलिस ने दोनों आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. अब सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया निचली अदालत में जारी रहेगी. इस फैसले को आरटीआई के दायरे और उसकी जिम्मेदारियों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है.