सुप्रीम कोर्ट ने काट दिए BCI के पर, अब हर नीतिगत फैसले में शामिल होंगे AG और SG

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नीतिगत फैसलों में AG और SG की भागीदारी अनिवार्य की. कोर्ट ने अध्यक्ष के 2030 तक कार्यकाल विस्तार पर सवाल उठाते हुए चुनाव कराने का रोडमैप दिया.  

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Sagar Bhardwaj

क्या सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज में पारदर्शिता और अनुशासन लाने के लिए भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) की भूमिका को अनिवार्य बना दिया है. देश की शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि नई संस्था के गठन तक BCI के हर नीतिगत फैसले में इन दो शीर्ष कानून अधिकारियों को 'सक्रिय रूप से शामिल' किया जाएगा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का पद 2030 तक विस्तारित नहीं माना जा सकता, बल्कि यह नई कार्यकारिणी के चुनाव तक केवल एक अंतरिम (Pro Tem) व्यवस्था है.  

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि 9 जनवरी 2025 के एक प्रस्ताव के तहत अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल करने का दावा किया गया था, जो एडवोकेट्स एक्ट के नियमों का सीधा उल्लंघन है. पीठ ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि प्रशासनिक शून्यता से बचने के लिए बनाए गए नियमों का इस्तेमाल चुनावों को टालने और पद पर बने रहने के लिए कैसे किया जा सकता है?

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने 2020 में बने PEARL ट्रस्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि इसके 11 प्रबंध ट्रस्टियों को BCI में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी स्थायी ट्रस्टी बना दिया गया है.   इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि क्या कोई निर्वाचित निकाय अपने संसाधनों का उपयोग ऐसे ट्रस्ट के निर्माण के लिए कर सकता है जिसमें व्यक्ति स्थायी रूप से बने रहें?


शीर्ष अदालत के अनुसार, संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के पास महिलाओं के सह-चयन को पूरा करने के लिए दो सप्ताह का समय होगा, जिसके बाद राज्य बार काउंसिल अपनी अंतिम सूची जारी करेंगे.   इसके बाद नए निर्वाचित प्रतिनिधि BCI के नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करेंगे. सुप्रीम कोर्ट अब 23 सितंबर को इस मामले पर अगली समीक्षा करेगा.