नई दिल्ली: स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि भारत की आजादी, लोकतंत्र और राष्ट्रीय गौरव का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है. स्वतंत्रता दिवस और लाल किला का संबंध आज हर भारतीय की भावनाओं से जुड़ा है. हर वर्ष प्रधानमंत्री इसकी प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं और पूरे देश को संबोधित करते हैं. यह परंपरा स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परंपराओं में शामिल हो चुकी है और करोड़ों लोगों को एक सूत्र में जोड़ती है.
भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी. तभी से यह दिन राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है. हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि लाल किले को समारोह का स्थायी केंद्र उसके ऐतिहासिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी पहचान और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक होने के कारण चुना गया. यही वजह है कि आज भी देश की नजरें हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की ओर रहती हैं.
लाल किला भारत के इतिहास में सत्ता, संस्कृति और संघर्ष का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसकी प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराकर राष्ट्र को संबोधित किया. उसी ऐतिहासिक क्षण से यह परंपरा शुरू हुई. इसके बाद से प्रत्येक प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर यहीं तिरंगा फहराते हैं. यह समारोह केवल ध्वजारोहण नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान और स्वतंत्र भारत की निरंतर यात्रा का प्रतीक माना जाता है.
लाल किले का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां ने 17वीं शताब्दी में कराया था. लाल बलुआ पत्थरों से बनी इसकी विशाल दीवारों ने इसे विशिष्ट पहचान दी, जिससे इसका नाम लाल किला पड़ा. यह किला लंबे समय तक मुगल शासकों का शाही निवास रहा. इसके भीतर भव्य महल, सुंदर उद्यान और महत्वपूर्ण दरबार आयोजित होते थे. समय के साथ यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल हो गया.
ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर में लाल किला स्वतंत्रता आंदोलन का भी प्रतीक बन गया. आजादी के बाद इसे राष्ट्रीय समारोहों का केंद्र बनाने का फैसला इसी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने की भावना से जुड़ा माना गया.लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराना उन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को भी याद करता है, जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया.
दिल्ली का लाल किला केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है. इसकी प्राचीर हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, एकता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का निरंतर उत्सव है. यही कारण है कि हर 15 अगस्त को पूरा देश लाल किले की ओर देखता है और तिरंगे के साथ अपने गौरव का उत्सव मनाता है.