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भारत की एक ऐसी रानी, अपने ही बेटे को दी मौत, दर्द से भरा जीवन, जानें इतिहास के पन्नों में दर्ज क्या है उनकी कहानी

मल्हारराव की दुनिया से जाने के बाद उनका बेटा मालेराव मालवा का सूबेदार के पद पर बैठा. गद्दी तो मिल गई थी लेकिन पिता जिनके अच्छे थे बेटा वैसा नहीं निकला. उनका आचरण खराब था. मां प्रजा के साथ जितनी विनम्र थीं बेटा उतना ही क्रूर. वो लोगों के साथ कठोर एवं निर्दयतापूर्वक व्यवहार करता. 

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Reepu Kumari

Ahilyabai Holkar Jayanti: भारत के इतिहास के पन्नों को जब-जब पलटा जाएगा तब-तब  देवी अहिल्याबाई होल्कर का जिक्र जरुर होगा. देश उनके जन्म के 300 साल मना रहा है. अहिल्याबाई न केवल एक रानी के रूप में उभरी हैं, बल्कि नैतिक शासन की एक वास्तुकार, अपने समय से बहुत आगे की दूरदर्शी और एक शासक के रूप में उभरी हैं, जिन्होंने सत्ता को सेवा में बदल दिया - निस्वार्थ सेवा.

उनकी कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है - यह न्याय, करुणा और आध्यात्मिक विश्वास में निहित नेतृत्व के लिए एक कालातीत खाका है. उनका जीवन भले ही दुखों से भरा था लेकिन उन्होंने लोगों के लिए अपने आंसुओं को दबा लिया. 

चरवाहे की बेटी थी अहिल्या

31 मई 1725 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के जामखेड कस्बे के ग्राम चांडी में अहिल्याबाई का जन्म हुआ था. आज का भारत इस जिले को अहिल्यानगर के नाम से जानता है. उनके पिता खुद एक मनकोजी राव शिंदे मराठा सेना में एक सैनिक थे. आगे चलकर वो नायक बने. उनकी माता सुशीला बाई भी गांव के एक सामान्य किसान परिवार से आती थी. ऐसे परिवार में पली बढ़ी अहिल्या सबसे पहले पेशवा बाजीराव का ध्यान अपनी ओर खींचा, जिन्होंने उसकी क्षमता को पहचाना और अपने भरोसेमंद मित्र और सहयोगी मल्हार राव होलकर को भावी बहू के रूप में उसकी सिफारिश की. मल्हार राव ने भी युवा अहिल्या के दृढ़ संकल्प को पहचाना और उसे अपने इकलौते बेटे खंडेराव की पत्नी के रूप में चुना.

दुखो से भरा था अहिल्याबाई का निजी जीवन

अहिल्याबाई को निजी जीवन में बहुत कम दिन सुख के मिले. उनके पति खांडेराव कुंभेरी की लड़ाई में तोप का गोला लगने से बहुत कम उम्र में ही मर गए. उस समय अहिल्याबाई की उम्र बमुश्किल 30 साल थी. उस दौर की रीति-रिवाजों के मुताबिक अहिल्याबाई अपने पति की चिता पर सती होने के लिए तैयार थीं, लेकिन उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने उन्हें ऐसा न करने की विनती की और उन्हें इंदौर राज्य और उसके लोगों के प्रति उनके कर्तव्य की याद दिलाई.  उसके बाद उन्होनें देश के लिए कई ऐतिहासिक काम किए. 

अपने ही बेटे को सजा-ए-मौत 

एनसीआरटी की पुस्तक में इस बात की जिक्र है कि आखिर क्यों अहिल्याबाई ने अपने ही बेटे को मौत की सजा सुनाई थी. वीरेंद्र तंवर ने किताब में बताया है कि मल्हारराव की दुनिया से जाने के बाद उनका बेटा मालेराव मालवा का सूबेदार के पद पर बैठा. गद्दी तो मिल गई थी लेकिन पिता जिनके अच्छे थे बेटा वैसा नहीं निकला. उनका आचरण खराब था. बेटे की वजह से अहिल्याबाई और दुखी और परेशान रहने लगी थीं. अहिल्याबाई  जितना समाज के लिए दीन धर्म का काम करती थी उनका बेटा उनके नेक काम से और चिढ़ता था. मालेराव उनके काम को धन की बर्बादी समझता था. मां प्रजा के साथ जितनी विनम्र थीं बेटा उनका ही क्रूर. वो लोगों के साथ कठोर एवं निर्दयतापूर्वक व्यवहार करता.  ब्राह्मणों को सताकर उसे मजा आता था.  उसकी गंदी आदत लगातार बढ़ती जा रही थी. तंग आकर एक दिन अहिल्याबाई ने मालेराव को हाथी से कुचलवा देने का आदेश दे दिया.