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'भारत छोड़ो आंदोलन, स्वाधीनता संग्राम पर भी चर्चा होनी चाहिए', संसद में जमकर बरसीं प्रियंका चतुर्वेदी

राज्यसभा में वंदे मातरम बहस के दौरान शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर व्यापक चर्चा की मांग की. उन्होंने आरोप लगाया कि 2014 के बाद इतिहास को व्हाट्सऐप हिस्ट्री के माध्यम से बदलने की कोशिश की गई है.

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Sagar Bhardwaj

राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार को तब और तीखी हो गई जब वंदे मातरम पर चल रही बहस के बीच शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक व्याख्या पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि आजादी के संघर्ष से जुड़ी कई मूल बातें जनता तक सही रूप में नहीं पहुंचाई जा रहीं. उनका दावा था कि 2014 के बाद इतिहास के कुछ अध्यायों को बदला, दबाया या “व्हाट्सऐप इतिहास” से बदलने का प्रयास किया गया है. उन्होंने संसद से इसे सुधारने की अपील की.

बहस में प्रियंका चतुर्वेदी के तीखे आरोप

चतुर्वेदी ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन, स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन के कई अहम हिस्सों को या तो कम करके बताया जा रहा है या नए स्वरूप में पेश किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप हिस्ट्री के माध्यम से सच को छिपाया जा रहा है, इसलिए मेरा आग्र है कि इन सभी मुद्दों पर सदन में चर्चा होनी चाहिए, जिससे पीढ़ियों को सच का पता चले.

'व्हाट्सऐप हिस्ट्री' पर उठाया सवाल

उन्होंने तर्क दिया कि इतिहास को राजनीतिक रूप से अनुकूल कहानियों से नहीं भरा जाना चाहिए. उनके अनुसार, सोशल मीडिया पर फैलने वाले आधे-अधूरे किस्सों को सही इतिहास के स्थान पर प्रचारित करना खतरनाक है और इ
ससे राष्ट्रीय स्मृति धुंधली पड़ती है.

संसद से ऐतिहासिक तथ्य सुधारने की मांग

चतुर्वेदी ने कहा कि संसद की जिम्मेदारी है कि स्वतंत्रता संग्राम के सभी पहलुओं को प्रमाणित और निष्पक्ष रूप में देश के सामने रखा जाए. उनका कहना था कि केवल आधिकारिक दस्तावेजों और शोध पर आधारित सामग्री ही पाठ्यक्रम और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होनी चाहिए.

विपक्ष और सत्ता पक्ष में वैचारिक टकराव तेज

उनकी टिप्पणी के बाद सदन में वैचारिक मतभेद फिर उभर आए. विपक्ष के कुछ सदस्यों ने भी उनके समर्थन में कहा कि इतिहास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, जबकि सत्ता पक्ष ने आरोपों को खारिज किया.

राष्ट्रीय पहचान और भविष्य की पीढ़ियों पर असर

बहस में यह चिंता भी उठी कि बदले हुए ऐतिहासिक वर्णन भविष्य की पीढ़ियों की समझ को प्रभावित कर सकते हैं. संसद में मौजूद कई सदस्यों ने कहा कि देश की पहचान उसी समय सुरक्षित रहेगी जब उसे उसकी वास्तविक ऐतिहासिक जड़ों के साथ समझाया जाएगा.