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Porsche crash Case: निबंध लिखकर न छूटने पाए पोर्शे का नाबालिग ड्राइवर, जानिए क्या करने जा रही है पुलिस

Porsche crash Case: पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने कहा है कि उन्होंने बोर्ड के सामने एक याचिका दायर की है कि किशोर का ट्रायल, एक वयस्क आरोपी के तौर पर हो. कोर्ट ऐसे ही केस की प्रक्रिया शुरू करे.

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India Daily Live

Porsche crash Case: महाराष्ट्र के पुणे हुए पोर्श कार एक्सीडेंट पर देशभर में उबाल है. यह बहस छिड़ गई है कि क्या नाबालिग अगर कोई गंभीर अपराध कर बैठे तो उसे महज निबंध भर लिखने से जमानत मिल जानी चाहिए, ऐसे में वह तो बाहर निकलकर और खौफनाक कृत्यों को अंजाम दे सकता है. पुणे के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने जबसे नाबालिग किशोर को जमानत दी, तब से ही यह बहस छिड़ी है. किशोर ने दो लोगों को सड़क पर अपने पोर्शे कार से कुचल दिया था.

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने कार हादसे में शामिल किशोर को 300 शब्दों का निबंध लिखने को कहर जमानत दे दी थी. अब पुलिस अधिकारी कोर्ट में यह अर्जी लगा रहे हैं कि इसका ट्रायल, वयस्क आरोपी की तरह ही हो, सिर्फ माफी मांगने से ही ऐसे जघन्य कृत्य में जमानत न मिल जाए. 

पुलिस ने किशोर के पिता और रियल स्टेट कारोबारी के खिलाफ केस दर्ज किया है. उसे गिरफ्तार भी कर लिया गया है.  यह पोर्शे कार 17 वर्षीय किशोर चला रहा था. कार चलाते वक्त वह नशे में था और उसने रविवार सुबह 3.15 पर मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों को टक्कर मार दी थी, जिसके बाद उन्होंने दम तोड़ दिया था.

किशोर को हादसे के बाद तत्काल जुवेनाइल बोर्ड के सामने पेश किया गया था. उसे कुछ ही घंटों में जमानत मिल गई थी. उसे कहा गया था कि वह ट्रांसपोर्ट कार्यालय जाए और यातायात नियमों की पढ़ाई करे. 15 दिनों के भीतर उसे एक निबंध लिखने को भी गया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि उसे चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ,  सड़क दुर्घटनाओं और उनके समाधान विषय पर 300 शब्दों का एक निबंध लिखना होगा. 

क्यों वयस्क की तरह ट्रायल चाहती है पुलिस?
जुवेनाइल बोर्ड ने किशोर को शराब मुक्ति केंद्र भेजने का भी निर्देश दिया था. किशोर को मिली त्वरित जमानत पर ही हंगामा बरपा है. ऐसे गंभीर मामलों में अगर इसी तरह जमानत मिली तो समाज पर इसका गंभीर असर पड़ेगा.  

पुलिस के मुताबिक, युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) और मोटर वाहन अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. धारा 304 में हत्या की 'इंटेंशन' नहीं होती है लेकिन गैर इरादतन हत्या हो जाती है. अगर किशोर पर धारा 304ए के तहत केस चले तो लापरवाही की वजह से किसी को मार डालने के आरोप तय होंगे. दोनों स्थितियों में 2 साल तक की जेल हो सकती है.

क्या है यह मामला?
रविवार सुबह करीब 3.15 बजे एक कपल बाइक के कल्याण नगर जंक्शन पर चल रहा था, तभी एक तेज रफ्तार पोर्शे कार उससे जा भिड़ी. अनीस अवधिया और अश्विनी कोस्टा की मौके पर ही मौत हो गई. दोनों की उम्र 24 साल थी. 

क्या चहती है पुणे पुलिस?
पुणे पुलिस कमिश्नर ने जुवेनाइल बोर्ड के सामने एक अर्जी दायर की थी कि इस केस का ट्रायल वयस्क के तौर पर हो और विजिलेंस हाउस में भेजा जाए. यह अपराध जघन्य है लेकिन पुलिस की अर्जी बोर्ड ने खारिज कर दी थी. पुणे के पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार ने कहा है कि अब पुलिस सेशन कोर्ट से रिलीफ मांगेगी. दुर्घटना के वक्त किशोर नशे में था.
पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने कहा, 'बार के सीसीटीवी फुटेज से साफ पता चलता है कि किशोर शराब पी रहा था. इसमें कोई शक नहीं है कि किशोर शराब पीने के बाद कार चला रहा था. हम ये सभी तथ्य अदालत को सौंपेंगे.'

क्यों मुश्किल होने वाली है किशोर की राह?
पुलिस कमिश्नर ने कहा है कि किशोर के पिता को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 75 और 77 के तहत केस दर्ज किया है. उसे शराब परोसने के लिए बार प्रतिष्ठान के मालिकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. यह केस अब क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई है.

धारा 75 कहती है कि किसी बच्चे को जानबूझकर शारीरिक या मानसिक विकृति के संपर्क में लाना है, वहीं धारा 77 बच्चों को जानबूझकर ड्रग और शराब परोसने पर लगाई जाती है. पुलिस ने कहा है कि इस केस को प्रोफेशनल तरीके से हैंडल किया जा रहा है. इस केस को पुलिस मजबूती से लड़ेगी.  

अब तक क्या कर चुकी है पुलिस?
कार एक्सीडेंट केस में पुलिस ने अभी तक 5 लोगों को गिरफ्तार किया है. 3 लोगों को देर रात में ही गिरफ्तार कर लिया है. किशोर के पिता को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. वह फरार चल रहा था.

क्या पुलिस करा पाएगी एडल्ट की तरह ट्रायल?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड और दिल्ली विधिक सेवा सलाहकार विशाल अरुण मिश्र बताते हैं कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है. किशोर की उम्र अभी 17 साल है. उसका ट्रायल जुवेनाइल बोर्ड में ही चलेगा, सेशन कोर्ट में केस चलना बेहद मुश्किल है, चाहे पुलिस धारा 403 लगाए या 403ए. एक किशोर का ट्रायल, निर्भया जैसे दुर्दांत केस में वयस्क की तरह नहीं हो पाया तो इस केस में होने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता. पुलिस सिर्फ कोशिश कर सकती है, चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो, अदालतें, किशोर को वयस्क की तरह ट्रायल देने से बचती हैं.