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दो पुलिसवाले, एक बंगला और दिल्ली की सत्ता! राजीव गांधी की जासूसी से कैसे गिर गई चंद्रशेखर की सरकार?

1991 में राजीव गांधी के 10 जनपथ आवास के बाहर दो हरियाणा पुलिसकर्मी पकड़े गए थे. जासूसी के आरोप के बाद कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया. जानिए पूरा घटनाक्रम.

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दो पुलिसवाले, एक बंगला और दिल्ली की सत्ता! राजीव गांधी की जासूसी से कैसे गिर गई चंद्रशेखर की सरकार?
Courtesy: Social Media

मार्च 1991, दिल्ली का 10 जनपथ, दो सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी. आरोप था कि वे राजीव गांधी की गतिविधियों पर नजर रख रहे थे. मामला देखने में इतना छोटा था कि शायद सामान्य दिनों में यह पुलिस और राज्य सरकार के स्तर पर सुलझ जाता. लेकिन उस समय केंद्र की सत्ता बेहद नाजुक थी. कांग्रेस बाहर से चंद्रशेखर सरकार को समर्थन दे रही थी और प्रधानमंत्री के पास लोकसभा में अपना बहुमत नहीं था.

2 मार्च को दो हरियाणा पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के बाद उठे जासूसी के आरोप ने कांग्रेस और प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बीच संबंधों को इतना बिगाड़ दिया कि कुछ ही दिनों में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया. 6 मार्च 1991 को चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

यही वजह है कि भारतीय राजनीति के इतिहास में 1991 का यह प्रकरण आज भी एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में याद किया जाता है. लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि दो पुलिसकर्मी 10 जनपथ के बाहर क्या कर रहे थे. असली सवाल यह था कि उन्हें वहां किसने भेजा था, वे किसकी जानकारी जुटा रहे थे और क्या इस पूरे मामले के पीछे केंद्र की राजनीति में चल रही कोई बड़ी खींचतान थी.

कैसे शुरू हुई चंद्रशेखर सरकार की कहानी?

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद की राजनीति पर लौटना जरूरी है.

1989 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, लेकिन बहुमत से काफी दूर रही. जनता दल के नेतृत्व में वीपी सिंह की सरकार बनी और उसे भाजपा तथा वाम दलों का बाहर से समर्थन मिला. हालांकि यह सरकार ज्यादा समय नहीं चल सकी.

भाजपा के समर्थन वापस लेने और जनता दल के भीतर टूट के बाद चंद्रशेखर अलग गुट के साथ सामने आए. उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया. उनके साथ लोकसभा के करीब 60 से अधिक सांसदों का समर्थन था.

कांग्रेस उस समय सबसे बड़ी पार्टी थी. राजीव गांधी ने चंद्रशेखर को बाहर से समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया. इस व्यवस्था में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन उनकी सरकार की राजनीतिक स्थिरता काफी हद तक कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर थी. यानी प्रधानमंत्री के पास अपनी सरकार चलाने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं थी और कांग्रेस जब चाहे समर्थन वापस लेकर सरकार को संकट में डाल सकती थी. यही कमजोर राजनीतिक आधार आगे चलकर 10 जनपथ के बाहर हुई कथित जासूसी को इतना बड़ा मुद्दा बनाने वाला था.

2 मार्च 1991: 10 जनपथ के बाहर पकड़े गए दो पुलिसकर्मी

2 मार्च 1991 को दिल्ली पुलिस ने राजीव गांधी के 10 जनपथ स्थित आवास के बाहर दो लोगों को पकड़ा. उनके नाम प्रेम सिंह और राज सिंह बताए गए. दोनों सादे कपड़ों में थे और पूछताछ में उनके हरियाणा पुलिस की CID से जुड़े होने की बात सामने आई. समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, दोनों को हरियाणा की खुफिया व्यवस्था से जुड़े काम के लिए लगाया गया था.

कांग्रेस का आरोप था कि ये दोनों राजीव गांधी और उनसे मिलने वाले नेताओं की गतिविधियों पर नजर रख रहे थे. बाद की रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि निगरानी का संभावित उद्देश्य हरियाणा की राजनीति से जुड़े कुछ नेताओं और जनता दल के असंतुष्ट नेताओं की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाना हो सकता था.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल था- अगर यह सिर्फ हरियाणा के राजनीतिक नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखने का मामला था, तो निगरानी राजीव गांधी के घर के बाहर क्यों हो रही थी? इसी सवाल ने कांग्रेस को आक्रामक होने का मौका दे दिया.

राजीव गांधी की नाराजगी और कांग्रेस का दबाव

उस समय राजीव गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे और कांग्रेस केंद्र में सरकार नहीं चला रही थी. इसके बावजूद चंद्रशेखर सरकार उन्हीं की पार्टी के समर्थन पर टिकी थी. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राजीव गांधी की जासूसी की जा रही है और इसके लिए हरियाणा पुलिस का इस्तेमाल किया गया.

4 मार्च को यह मुद्दा संसद में भी उठा. संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज बहस से पता चलता है कि राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी कार्यालय की कथित निगरानी का मुद्दा सदन में गंभीरता से उठाया गया था. प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कहा कि केंद्र सरकार इस तरह की निगरानी नहीं करा रही थी और सरकार को मामले की जानकारी मिलने के बाद जांच शुरू की गई है. उन्होंने ऐसे काम को अस्वीकार्य और अनैतिक बताया. यानी चंद्रशेखर ने संसद में खुद को इस कथित निगरानी से अलग किया, लेकिन कांग्रेस इससे संतुष्ट नहीं हुई.

हरियाणा के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला का नाम क्यों आया?

इस पूरे मामले में हरियाणा की राजनीति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी. उस समय हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की सरकार थी और चौटाला चंद्रशेखर के राजनीतिक खेमे से जुड़े प्रमुख नेताओं में थे. इसलिए कांग्रेस के लिए यह सवाल स्वाभाविक था कि हरियाणा पुलिस के कर्मचारी दिल्ली में राजीव गांधी के घर के बाहर आखिर किसके निर्देश पर पहुंचे थे.

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि हरियाणा के गृह मंत्री संपत सिंह की भूमिका थी और इसके पीछे चौटाला का राजनीतिक निर्देश हो सकता है. समकालीन रिपोर्टों में यह बात भी सामने आई कि चंद्रशेखर ने मामले की जांच कराने की पेशकश की थी.

रंजीत सिंह की कहानी भी चर्चा में आई

इस प्रकरण का एक और दिलचस्प पहलू हरियाणा की अंदरूनी राजनीति से जुड़ा था. ओम प्रकाश चौटाला के भाई रंजीत सिंह का नाम इस पूरे मामले में सामने आया. कुछ समकालीन और बाद की रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि रंजीत सिंह ने राजीव गांधी को कथित निगरानी की जानकारी दी थी.

रंजीत सिंह का चौटाला परिवार के साथ राजनीतिक मतभेदों का इतिहास था. इसलिए इस घटनाक्रम के पीछे हरियाणा की अंदरूनी राजनीति की भूमिका होने की अटकलें भी लगाई गईं.

चंद्रशेखर ने सफाई देने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी

चंद्रशेखर जानते थे कि उनकी सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी संख्या बल थी. इसलिए उन्होंने विवाद को खत्म करने की कोशिश की. उन्होंने जांच का भरोसा दिया और यह स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने राजीव गांधी की निगरानी का कोई आदेश नहीं दिया.

लेकिन कांग्रेस के लिए अब मामला सिर्फ पुलिसकर्मियों का नहीं रह गया था. कांग्रेस नेतृत्व यह जानना चाहता था कि आखिर ये लोग किसके निर्देश पर काम कर रहे थे.

4 और 5 मार्च के आसपास संसद में इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और सरकार के बीच तनाव बढ़ता गया. कांग्रेस ने सरकार पर दबाव बढ़ाया और संसद की कार्यवाही से दूरी बनाने का फैसला किया. राजनीतिक स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी.

चार महीने पुरानी सरकार पर मंडराया संकट

चंद्रशेखर ने नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री पद संभाला था. उनकी सरकार को अभी चार महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि सहयोगी कांग्रेस के साथ टकराव खुलकर सामने आ गया.

यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गणित समझना जरूरी है

चंद्रशेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी थी. इसलिए कांग्रेस के समर्थन में जरा सा बदलाव भी सरकार के अस्तित्व पर सीधा असर डाल सकता था. कांग्रेस के पास सरकार गिराने के लिए किसी बड़े संवैधानिक संकट की जरूरत नहीं थी. उसे सिर्फ अपना समर्थन वापस लेना था. और आखिरकार वही हुआ.

6 मार्च 1991: चंद्रशेखर ने दे दिया इस्तीफा

जासूसी विवाद के बाद कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया. इसके बाद चंद्रशेखर ने 6 मार्च 1991 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन को अपना इस्तीफा सौंपा. इस तरह एक ऐसी सरकार का अंत हो गया जिसे कुछ ही महीने पहले राजीव गांधी की कांग्रेस ने सत्ता तक पहुंचाया था.

दिलचस्प बात यह थी कि चंद्रशेखर और राजीव गांधी के बीच राजनीतिक संबंधों का यह बदलाव बहुत तेजी से हुआ. नवंबर 1990 में राजीव गांधी के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे और मार्च 1991 में उन्हीं राजीव गांधी की पार्टी के समर्थन वापस लेने के कारण सरकार संकट में आ गई.

क्या सिर्फ दो पुलिसवालों की वजह से सरकार गिरी?

ऊपरी तौर पर देखें तो घटनाओं की कड़ी सीधी नजर आती है- दो पुलिसकर्मी पकड़े गए, जासूसी का आरोप लगा, कांग्रेस नाराज हुई, समर्थन वापस लिया गया और चंद्रशेखर ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन राजनीति इससे कहीं ज्यादा जटिल थी.

चंद्रशेखर सरकार शुरू से ही कमजोर संख्या बल पर टिकी थी. कांग्रेस और सरकार के बीच कई मुद्दों पर अविश्वास था. आर्थिक स्थिति भी गंभीर थी और सरकार पूर्ण बजट पेश करने की स्थिति में नहीं थी. ऐसे में 10 जनपथ की कथित निगरानी ने पहले से मौजूद राजनीतिक अविश्वास को विस्फोटक बना दिया.

इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि दो पुलिसकर्मियों की कथित जासूसी अकेले सरकार गिरने की वजह नहीं थी, बल्कि वह एक बेहद कमजोर गठजोड़ में पैदा हुआ निर्णायक राजनीतिक संकट बन गई.

क्या कभी पता चला कि जासूसी का आदेश किसने दिया था?

यही इस कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा है.

दोनों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और उनके हरियाणा CID से जुड़े होने की बात सामने आई, लेकिन इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण सवाल- उन्हें वास्तव में किसने भेजा था? पूरी तरह साफ नहीं हो सका.

बाद के वर्षों में भी इस मामले को लेकर सवाल उठते रहे. इंडियन एक्सप्रेस के एक अभिलेखीय विश्लेषण के अनुसार, बाद में इस कथित निगरानी की पूरी तह तक जाने के लिए कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई और यह स्पष्ट नहीं हो सका कि दोनों पुलिसकर्मियों को किसने आदेश दिया था.

यानी भारतीय राजनीति के इतिहास में यह एक ऐसा मामला बन गया जिसमें सरकार गिर गई, लेकिन सरकार गिराने वाले आरोप का अंतिम सच पूरी तरह सामने नहीं आया.

संसद के रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?

इस कहानी को समझने के लिए संसदीय रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाद के राजनीतिक किस्सों में कई बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही गईं.

4 मार्च 1991 को लोकसभा में राजीव गांधी और कांग्रेस कार्यालय की कथित निगरानी का मुद्दा उठाया गया. प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने स्पष्ट कहा कि उनकी सरकार ने निगरानी नहीं कराई थी और यह मामला सामने आने के बाद सरकार ने जांच शुरू की थी. उन्होंने यह भी कहा कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

5 मार्च को राज्यसभा में भी 'Surveillance at the residence of Shri Rajiv Gandhi by the Haryana Police' शीर्षक से इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री का बयान दर्ज है. इससे यह साफ होता है कि मामला केवल मीडिया में चल रही राजनीतिक चर्चा नहीं था. यह संसद के दोनों सदनों तक पहुंच चुका था और केंद्र सरकार को इस पर सफाई देनी पड़ी थी.

इस्तीफे के बाद क्या हुआ?

चंद्रशेखर के इस्तीफे के बाद देश एक बार फिर मध्यावधि चुनाव की ओर बढ़ गया. 1991 में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई. इसी चुनाव अभियान के दौरान 21 मई 1991 को राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में हत्या कर दी गई. इस हत्या ने भारतीय राजनीति को पूरी तरह बदल दिया.

चुनाव के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी और पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने. इस तरह 1991 की वह राजनीतिक उथल-पुथल, जो 10 जनपथ के बाहर पकड़े गए दो पुलिसकर्मियों से शुरू हुई थी, कुछ ही महीनों में देश को एक नए राजनीतिक दौर में ले गई.

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू क्या है?

भारतीय राजनीति में सरकारें आमतौर पर बड़े घोटालों, अविश्वास प्रस्तावों, दलबदल या बड़े जन आंदोलनों के कारण गिरती रही हैं. लेकिन 1991 का मामला अलग था.

यहां सत्ता का संकट एक ऐसे आरोप से पैदा हुआ जिसमें दो सादे कपड़ों वाले पुलिसकर्मी, एक पूर्व प्रधानमंत्री का घर, हरियाणा की अंदरूनी राजनीति और दिल्ली की सत्ता के बीच संबंध जुड़ गए. और सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस सरकार को राजीव गांधी ने सत्ता में आने में मदद की थी, वही सरकार कुछ महीने बाद राजीव गांधी से जुड़े जासूसी विवाद के कारण कांग्रेस के समर्थन से वंचित हो गई.

चंद्रशेखर सरकार का पतन भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति का एक असाधारण अध्याय है. 2 मार्च 1991 को 10 जनपथ के बाहर पकड़े गए हरियाणा CID से जुड़े दो पुलिसकर्मियों की घटना ने राजीव गांधी और चंद्रशेखर के बीच पहले से मौजूद राजनीतिक अविश्वास को खुला संकट बना दिया.

कांग्रेस ने कथित जासूसी को गंभीर मामला माना और चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया. 6 मार्च को चंद्रशेखर ने इस्तीफा दे दिया. लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल आज भी वही है- क्या सचमुच राजीव गांधी की जासूसी की जा रही थी और अगर हां, तो आदेश किसने दिया था?

उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड इस सवाल का कोई ऐसा निर्णायक उत्तर नहीं देते जिसे अंतिम सत्य कहा जा सके. और शायद यही वजह है कि भारतीय राजनीति के इतिहास में 1991 की यह घटना आज भी एक ऐसे सियासी रहस्य के तौर पर याद की जाती है, जिसमें सरकार तो गिर गई, लेकिन जासूसी का पूरा सच सामने नहीं आया.