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गाजा में शांति के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर अड़े ट्रंप, इधर पीएम मोदी UN को कर रहे मजबूत; जानें क्या है ये कूटनीति?

गाजा संकट के बीच ट्रंप तात्कालिक 'बोर्ड ऑफ पीस' समाधान पर जोर दे रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी संयुक्त राष्ट्र सुधार के जरिए दीर्घकालिक वैश्विक स्थिरता की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

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Kuldeep Sharma

दुनिया इस समय कूटनीति के दो अलग-अलग मॉडल देख रही है. गाजा में युद्धविराम के बावजूद हिंसा पूरी तरह थमी नहीं है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' के जरिए तत्काल समाधान का रास्ता चुना है. दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक संस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं. उनका मानना है कि स्थायी शांति शॉर्टकट से नहीं, बल्कि मजबूत और प्रतिनिधित्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से आएगी.

गाजा संकट और ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’

गाजा में हालिया युद्धविराम के बावजूद हालात अब भी नाजुक बने हुए हैं. इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहल की है. उनका जोर तुरंत फैसले लेने और व्यक्तिगत प्रभाव के जरिए समाधान निकालने पर है. ट्रंप की यह रणनीति मिडिल ईस्ट में अमेरिकी भूमिका को मजबूत करने और तेजी से परिणाम दिखाने पर केंद्रित मानी जा रही है.

पीएम मोदी की सोच- तात्कालिक नहीं, स्थायी समाधान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति किसी एक युद्ध या क्षेत्र तक सीमित नहीं है. उनका मानना है कि जब तक वैश्विक संस्थाएं मजबूत नहीं होंगी, तब तक शांति टिकाऊ नहीं हो सकती. भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुधार की मांग करता रहा है. पीएम मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार यह कहते आए हैं कि मौजूदा वैश्विक ढांचा आज की सच्चाइयों को नहीं दर्शाता.

ब्राजील के साथ साझेदारी और ग्लोबल साउथ

पीएम मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के बीच हालिया बातचीत इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है. दोनों नेताओं ने ग्लोबल साउथ की साझा आवाज को मजबूत करने की जरूरत पर सहमति जताई. उनका मानना है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को वैश्विक फैसलों में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. यह बातचीत केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि बहुपक्षीय राजनीति का संकेत है.

UNSC सुधार क्यों बन गया है जरूरी

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 की परिस्थितियों में हुई थी, लेकिन 2026 की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है. आज सबसे ज्यादा संघर्ष उन्हीं क्षेत्रों में हैं, जिनकी आवाज सुरक्षा परिषद में कमजोर है. भारत समेत कई देशों का तर्क है कि मौजूदा परिषद न तो संतुलित है और न ही प्रभावी. यही वजह है कि UN की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

G4 बनाम UFC और डिप्लोमेसी का टकराव

भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के G4 समूह ने चेतावनी दी है कि सुधारों में देरी से वैश्विक संकट और गहराएगा. वहीं ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ समूह स्थायी सीटों के विस्तार का विरोध कर रहा है. भारत ने साफ कहा है कि सुधार रोकना समस्या का हिस्सा बनना है. यहीं ट्रंप और मोदी की डिप्लोमेसी का फर्क साफ दिखता है- एक त्वरित सौदे पर, दूसरा दीर्घकालिक वैश्विक व्यवस्था पर भरोसा करता है.