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'नारी शक्ति देख रही है': महिला आरक्षण पर पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक, विपक्ष को दिया ब्लैंक चेक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में महिला आरक्षण बिल को महज एक राजनीतिक मुद्दा न मानकर विपक्ष के लिए एक बड़ी नैतिक चुनौती में बदल दिया.

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Ashutosh Rai

संसद में महिला आरक्षण अधिनियम पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा सियासी और नैतिक दांव चला है, जिसने विपक्ष को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है. पीएम मोदी ने इस बिल को महज एक राजनीतिक मुद्दा न मानकर इसे सीधे नारी शक्ति के अधिकारों से जोड़ दिया है.

विपक्ष को सीधी चेतावनी

सदन में अपने 40 मिनट के भाषण में पीएम मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि देश की महिलाएं सांसदों के फैसलों से ज्यादा उनकी नीयत को परख रही हैं. उन्होंने आगाह किया कि जो लोग महिलाओं को यह अधिकार देने का विरोध करेंगे. उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, क्योंकि इतिहास ऐसे लोगों के प्रति कभी नरम नहीं रहा है. उन्होंने सांसदों को नसीहत दी कि वे इस भ्रम या घमंड में न रहें कि वे महिलाओं को कुछ दे रहे हैं, बल्कि यह महिलाओं का अधिकार है.

क्रेडिट की होड़ नहीं

एक चतुर राजनेता की तरह मोदी ने इस बिल का सारा श्रेय विपक्ष को देने की पेशकश करके सबको चौंका दिया. उन्होंने सदन में कहा, "मैं आपको एक ब्लैंक चेक देता हूं... मुझे इसका श्रेय नहीं चाहिए". यहां तक कि उन्होंने बिल पास होने पर होर्डिंग्स में सभी नेताओं की तस्वीरें लगाने तक का ऑफर दे डाला. यह पीएम का एक अचूक राजनीतिक दांव था, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि बिल का विरोध करने से उन्हें ही सियासी फायदा होगा, लेकिन साथ मिलकर चलने पर किसी को राजनीतिक फायदा नहीं होगा.

तकनीकी बहानों की निकाली हवा

पीएम मोदी ने विपक्ष पर महिलाओं के आरक्षण को अटकाने के लिए तकनीकी बहानेबाजी करने का कड़ा आरोप लगाया. विपक्ष का पहला बहाना परिसीमन को नई जनगणना से जोड़ने का था, जिस पर पीएम ने तर्क दिया कि 2029 से पहले इसे लागू करने के लिए 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल एक गणितीय जरूरत है. दूसरा बहाना उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीटों के बंटवारे का था. इस पर मोदी ने गारंटी दी कि निर्वाचन क्षेत्रों के बढ़ने से किसी भी राज्य का आनुपातिक हिस्सा नहीं बदलेगा और बढ़ोतरी सभी राज्यों में एक समान होगी. 

इतिहास से लिया सबक

पीएम ने याद दिलाया कि यह कानून पहले ही 30 साल देर से आया है. 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार, 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और बाद में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसे पास कराने के प्रयास विफल रहे थे और इन नेताओं को सत्ता गंवानी पड़ी थी.