वोट बैंक की राजनीति में बदल रही मुंबई की पहचान! क्या जानबूझकर बिगाड़ा जा रहा है आबादी का संतुलन?

मुंबई में चुनावी सियासत तेज हो गई है. अवैध बस्तियों, आबादी में बदलाव और वोट बैंक की राजनीति शहर की मूल पहचान और मराठी अस्मिता पर सवाल उठा रही है.

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Kuldeep Sharma

मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई अब सिर्फ आर्थिक केंद्र नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी मुख्य केंद्र बन गई है. चुनाव नजदीक आते ही शहर की आबादी, अवैध बस्तियों और जातीय-सामुदायिक समीकरणों पर सियासत तेज हो गई है. महाविकास आघाड़ी (MVA) पर आरोप हैं कि उनकी नीतियों से कुछ समुदायों का दबदबा बढ़ेगा और शहर की असली पहचान खतरे में पड़ सकती है. अब सवाल यह है कि मुंबई किस दिशा में आगे बढ़ रही है.

अवैध बस्तियों का विवाद

मुंबई के बेहरामपाड़ा, मालवणी और कुर्ला जैसी बस्तियों में अवैध निर्माण का विस्तार जारी है. MVA पर आरोप हैं कि इन्हें झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास के नाम पर वैध बनाने की कोशिश की गई. आलोचक इसे प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति मानते हैं, जिससे किसी विशेष समुदाय के लिए वोट बैंक तैयार हो सकता है. इससे शहर की जनसांख्यिकीय संरचना में बदलाव और भविष्य के चुनावों पर प्रभाव की संभावना जताई जा रही है.

मराठी पहचान बनाम बाहरी प्रवास

मुंबई में मराठी भाषियों की पहचान दशकों से राजनीति का मुद्दा रही है. आलोचना है कि MVA के शासन में बाहरी प्रवासियों का समर्थन बढ़ा. महंगाई और ऊंची मकान कीमतों के कारण मराठी मध्यम वर्ग ठाणे, कल्याण, डोंबिवली और विरार जैसे क्षेत्रों में जा रहा है. विपक्ष आरोप लगाता है कि विदेशी आबादी को राशन या दस्तावेज देने की नीति सिर्फ वोट बैंक बनाने की चाल है, जो शहर की मूल सुरक्षा और पहचान को प्रभावित कर सकती है.

प्रतीकात्मक राजनीति और सत्ता का खेल

महापौर पद पर मुस्लिम चेहरे की संभावना ने सियासी बहस को जन्म दिया. इसे कुछ लोग समावेशिता कह रहे हैं, जबकि अन्य इसे तुष्टिकरण की राजनीति मानते हैं. आलोचना यह भी है कि MVA के शासन में कुछ विवादित फैसले, जैसे याकूब मेमन की कब्र का सौंदर्यीकरण और अजान से जुड़े मामलों, समाज में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देने वाले रहे.

दोहरी राजनीति और वोट बैंक रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हिंदू समाज को जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय मुद्दों में बांटा जा रहा है, जबकि मुस्लिम वोटों को एकजुट किया जा रहा है. आरक्षण और क्षेत्रीय अस्मिताओं को मुद्दा बनाकर हिंदू वोटों में फूट डाली जा रही है. अल्पसंख्यकों को 'भय' या तुष्टिकरण के माध्यम से एकत्र किया जा रहा है. यह रणनीति केवल मुंबई तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की सियासत को प्रभावित कर रही है.

शहर की असली पहचान खतरे में

मुंबई केवल आर्थिक केंद्र नहीं, बल्कि मराठी संस्कृति और भारतीय अस्मिता की नींव पर टिका शहर है. वोट बैंक की राजनीति, अवैध प्रवासियों का संरक्षण और राजनीतिक स्वार्थ शहर की पहचान को खतरे में डाल सकते हैं. नागरिकों के लिए यह चुनौती है कि वे विकास-केंद्रित राजनीति और पहचान को बचाने वाली राजनीति के बीच चुनाव करें.

भविष्य की दिशा और नागरिकों की भूमिका

मुंबई का भविष्य अब नागरिकों की जागरूकता और राजनीतिक निर्णय पर निर्भर है. यदि शहर की मूल संस्कृति और सामाजिक संतुलन को बनाए रखा गया, तो आर्थिक और सामाजिक विकास संभव है. जनता की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक दलों को वोट बैंक और पहचान से समझौता करने से रोके. मुंबई की असली पहचान बचाने के लिए सही दिशा चुनना अब समय की मांग है.